शुक्रवार, 29 जून 2012

स्कूल स्थानांतरण प्रमाण पत्र या टीसी बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में बाधक issuing transfer certificate from the school is major problem.

Issuing transfer certificate from the school is major problem.
मै इस माह अपनी बच्ची को रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित एक ब्रांडेड स्कूल से निकालकर एक सस्ते और जहाँ पढ़ाई होती है लुटाई नही होती डालना चाहता हँू। लेकिन जब मेरी पत्नि उस ब्रांडेड स्कूल में टीसी के लिये गई तो स्कूल प्रबंधन ने पहले तो कहा कि इस साल से हमने और अच्छे टीचर रख लिये हैं अब पढ़ाई अच्छी होगी लेकिन मैने तो तय कर लिया है अपनी बच्ची को इस महल जैसे स्कूल से छुटकारा दिलाने के लिये क्योकि इन जैसे महल टाइप स्कूलों में ना तो पढ़ाई होती है ना ही बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा बेहतर मिल पाती है बच्चा नर्सरी से लेकर दूसरी क्लास तक ये नही सिख पाता कि हिन्दी के बाराखड़ी या इंग्लिश में वर्व या टेन्स क्या होते हैं ना ही गुणा भाग। और कोर्स की किताबें इस अनुसार या ऐसी होती हैं जैसे हमारा बच्चा हिन्दी या इंग्लिश पढ़ने, लिखने और समझने में एक एक्पर्ट है। इस जैसे स्कूल हमारे बच्चों को एक मैसेन्जर या संदेश वाहक बना लेते हैं, हमारा बच्चा हर सप्ताह एक संदेश लेकर आता है कि  मेडम  ने फलां काम के लिये इतने पैसे या फलां कार्यक्रम के लिये फलां टाइप की ड्रेस या स्वतंत्रता दिवस के लिये स्कूल कंगाल हो चुका है झंडा फहराने के लिये 50रू चाहिये और पता नही क्या-क्या ये भिखमांगे लोग संदेश द्वारा मांगते रहते हैं। जबकि करोडों रू दान में अर्जित करते हैं। केवल फॉरमेलिटी या ये कहें कि केवल खर्चा-खर्चा और खर्चा। और यदि आप टीसी निकलवाने के लिये जून या जुलाई में एप्लीकेशन देते हैं तो कहा जाता है कि अपै्रल में ही टीसी निकलवानी थी आपको अब यदि आपको टीसी चाहिये तो एनुअल चार्जेस 1500-2000 रू. तो देने ही होंगे अन्यथा टीसी नही मिलेगी।
अब यदि दूसरे स्कूल में जाकर हम ये बताएँ कि फलां स्कूल वाले टीसी नही दे रहे तो वह अपने हाथ खड़े कर देते हैं कि बिना टीसी के हम एडमिशन या प्रवेश नही दे सकते। अभिभावक इस समस्या से इतने एरिटेट या चिढ़ने लगते हैं कि वे उसी पहले वाले स्कूल में अपने बच्चों एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद कर देते हैं।
जब हमारी सरकार या प्रशासन को मालूम है कि अभिभावक या बच्चा कक्षा 8 तक या 10 तक किसी भी हालत में दो स्कूल्स में नही पढ़ सकता तो फिर क्यो दूसरे स्कूल में प्रवेश के लिये टीसी कि अनिवार्यता लागू की गई है जबकि बच्चे की मार्कसीट भी तो उसी स्कूल की होती है, टीसी कोई करेंसी पेपर पर तो प्रिंट होती नही जो कोई डुप्लीकेट नही बना सकता। हमारे भोपाल शहर की इस समस्या के कारण मैने एक सबसे बड़ी खामी महसूस की है कि यदि आप किसी स्कूल से पीड़ित हैं तो केवल एक डीईओ आॅफिस (DEO Office Bhopal or DEO, BHOPAL Email ; deobho-mp@nic.in ) है शिकायत करने के लिये वहां प्रतिदिन सैकड़ों लोग इसी समस्याा को लेकर आते हैं यदि डीईओ को समस्या बताओं तो केवल एक फॉरमेलिटी वाला जवाब कि शिकायत लिख कर दे दें। शिक्षा मंत्री महोदया का ईमेल पूरे नेट पर कहीं नहीं, जो इनके करीबी आॅफिसर हैं वे फोन पर या मोबाईल पर समस्या सुनते ही कहते हैं मिलकर बताना और मिलना ऐसे है जैसे प्रधानमंत्री से मिलना हो। इन ट्रस्टों द्वारा संचालित स्कूलों की पकड़ भी बहुत होती है राजनीति या ब्यूरोके्रट्स में बड़ी टेड़ी खीर है इनके खिलाफ शिकायत को अंजाम तक पहुंचाना।


भोपाल कलेक्टर महोदय ने 1-2 साल पहले सभी स्कूलों को यह निर्देश दिया था कि कोई भी स्कूल एक ही दुकान से अभिभावकों को किताबें लेने पर मजबूर न करें लेकिन इस निर्देश की लगभग सभी प्राइवेट स्कूल्स धज्जियाँ उड़ा रहें हैं। केजी 1 से लेकर कक्षा दूसरी तक की किताबें यदि यकीन न हो तो पता करें ये स्कूल्स 1100-1300 रू. तक में अपनी कमीशन वाली दुकानों से लेने को मजबूर कर रहे हैं। ये एक ट्रिक अपनाते हैं ऐसी दुकान का पता देते हैं जो स्कूल्स से काफी दूर होती हैं भोपाल के दूसरे कोने में। यदि कोई आधा कोर्स लेना चाहता है तो ये मना कर देते हैं। और जब इनके पास कोई किताब कम होती है तो कहते हैं अभी इतनी ले जाओं बाद में ले जाना। लुटाई जारी है। हर साल बच्चे की फीस के साथ एनुअल चार्जेस के नाम पर 1500-2000 रू तक वसूलते हैं बताते भी नही कि किस बात के वसूल रहे हैं।


4 july'12 bhaskar bhopal

6 july12 bhaskar bhopal
24 JULY12 BHASKAR BHOPAL
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17 june 2013

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मंगलवार, 19 जून 2012

भोपाल की सबसे गंभीर समस्या-कहाँ पढ़ें हम, घर चले हम। Schools in Bhopal

नये भोपाल के अधिकतर स्कूलों ने अपनी फीस दोगुनी कर दी है, एनुअल फीस या री-एडमिशन के नाम पर 2500-3000 रू तक वसूले जा रहे हैं, कॉलोनियों में स्कूल ही नही हैं। बिल्डरों ने कॉलोनियाँ तो बना दी हैं लेकिन स्कूल कौन बनाएगा, कॉलोनियों में स्कूल के लिये जगह भी नही छोड़ी। क्या हम अपने 4 साल के बच्चों को 6 कि.मी. बस से पढ़ने भेजें या अपना काम धंधा छोड़ स्कूलों में अपडाउन करें। सरकारी स्कूल तो कॉलोनियों के आस पास ढंूढने से भी नही मिलते। आंगनबाड़ियों तो केवल अब गांव की ही शान रह गई हैं। नये भोपाल में हिन्दी मीडियम स्कूल कौन खुलवायेगा? जो ट्रस्टों द्वारा संचालित स्कूल्स हैं क्या उनके द्वारा दान में अर्जित करोड़ों रूपये स्वीस बैंक में जाता है। भीख मांगने का लायसेंस लो ना यार, स्कूल खोलने का क्यो ले लिया। क्यों अप्रत्यक्ष रूप से अभिभावकों को लूट रहे हो? मध्ययवर्गीय परिवारों के पास गरीबी रेखा का राशन कार्ड तो है नही कैसे बडेÞ स्कूलों में एडमिशन का लाभ लें? शासन द्वारा जो कोर्स शासकीय स्कूल में मान्य है प्राइवेट स्कूल्स में क्यों नही? क्यों ये प्राइवेट स्कूल्स अपनी कमाई कर रहे हैं घटिया पब्लिकेशन की बुक्स बिक्री के लिये बाध्य कर। एसबीआई क्यो हर साल रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित स्कूल विवेकानंद ज्ञानपीठ, अवधपुरी, भेल, भोपाल को लाखों रूपये दान देता है? जबकि ये स्कूल के बच्चों को फीस में 1 रू. की भी रियायत नही देता, लूट मचा रखी है। इस स्कूल का बस नही चले नही तो ये बच्चों के चेहरे पर भी स्कूल का लोगो अनिवार्य कर दे। हमारा बच्चा किसी युद्ध में लड़ने नही जा रहा, पढ़ने जा रहा है जरूरी नही कि हर चीज पर स्कूल का लोगो लगा हो।
17 june 2013
18 june 2013
18 june 2013
24 JUNE 2013
23 june 2013 ln star news
5 july 2013
8 april 2015

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शुक्रवार, 24 जून 2011

राम और कृष्ण के नाम पर धंधा जोरों पर है.

9th OCT 2014 BHASKAR BHOPAL
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जिस स्कूल को ये दान दिया गया है ये अवधपुरी भेल में भव्य स्कूल संचालित करता है इस स्कूल में अगर बच्चा kg -2 से 1st क्लास में जाता है तो re admission के नाम पर पैसा बसूल किया जाता है, हर साल यूनीफोर्म में change किया जाता है, जैसे यदि स्कूल का लोगो शर्ट पर था तो इस बर्ष शर्ट की बाह पर. किताबों का publication हर साल change कर दिया जाता है ताकि बच्चे का बहन या भाई उस कोर्स को use न कर सके. १५ अगस्त और २६ जन. को झंडा वंदन के नाम पर बच्चों से २०-५० रुप्पे तक बसूल किये जातें हैं. और उन्हें दिया जाता है १ लड्डू और २ choclate . जिसके कीमत होती है १० रुप्पे. fees के रूप में और अन्य खर्चों जिससे बच्चों का कोई लेना देना नहीं होता बसूल किया जाता है. इस स्कूल को देख कर नहीं लगता की इसे पैसो की जरुरत है. राम और कृष्ण के नाम पर धंधा जोरों पर है. यदि कोई अभिभावक प्रबंधन से इन खर्चो का हिसाब मागता है तो उसे कहा जाता है की नहीं पढ़ा सकते तो अपने बच्चो का नाम कटा लो. इन ९ लाख रुप्पे में तो इस स्कूल के सभी बच्चो का इस साल का course आ जाता. फीस भी भरा जाती. एक पुस्तिका जिसमे फीस की details और फॉर्म होता है जिसकी प्रिंटिंग के बाद कीमत अधिक से अधिक २० रुप्पे पड़ती है को बच्चों के अभिभावक को ५० रुप्पे में दी जाती है.

   
शिक्षक दिवस पर बच्चों को 50 पैसे वाली घटिया चॉकलेट दी जाती है। यदि आप इस स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान जो कि पूरी भोपाल में इकलौती होती है (जबकि प्रशासन के आदेश है कि कोई भी स्कूल किसी विशेष दुकान से कोर्स की किताब खरीदने के लिये अभिभावकों को मजबूर नही कर सकता) पर शिक्षण सत्र के शुरूआत में कोई इक्का दुक्का किताब छूट जाये तो पूरे साल भर उस दुकान के चक्कर लगाने पड़ेंगे उस किताब को खरीदने के लिये क्योकि क्लास में टीचर रोज बच्चे को कान पकड कर खड़ा कर देती है क्योकि उसके पास वह किताब नही होती। अगर हम स्कूल में जाकर ये कहें कि किताब दुकान पर नही है कृपया दूसरी दुकान का पता दे दीजिए तो जबाव मिलता है किताब दुकान पर आ गई है ले आयें और दुकानदार कहता है अब तो अगले साल ही आयेगी, यदि चाहिये हो तो कुछ डिफेक्ट माल पड़ा हुआ है में से दे देते हैं। और रोज आपका बच्चा स्कूल से घर आकर कहेगा मेडल रोज किताब लाने को कहती हैं।
इस स्कूल में पहली क्लास के बच्चों को वह इंग्लिश पढ़ाई जाती है (डायरेक्ट लम्बी-लम्बी स्टोरिज) जो हमने अपने स्कूल टाइम में 6वीं या 7वीं क्लास में पढ़ी थी। नो स्पेलिंग नो ग्रामर डायरेक्ट पंचतंत्र की कहानियाँ वो भी इंग्लिश में। यदि हम स्कूल प्रबंधन से ये जाकर बोले कि आप हमारे बच्चें को कम से कम बेसिक तो पढाईये कम से कम हिंदी की बाराखड़ी तो सिखाईये जब बाराखड़ी ही बच्चों को नही आयेगी तो ये लम्बी लम्बी किताबे कैसे पढ़ेंगे। तो जबाब मिलता है टीचर्स मीटिंग में आना। और टीचर्स मीटिंग में यदि आप जाओ तो केवल प्रींसिपल ही बोलता है बाकि तो केवल सुनते हैं और यदि कोई अपने बच्चों की पढ़ाई से रिलेटिड कुछ कह दे तो समझो उस मीटिंग में सबसे बड़ा मूर्ख वही है।
इस स्कूल का एक और शोषण करने का तरीका है : हर दूसरे माह में अभिभावको को दो माह की फीस भरना पड़ती है और अगले माह एक महीने की और जब स्कूल दुबारा खुलता है तो एनुअल चार्जेस के नाम पर एक भारी भरकम एमाउंट फिर बसूला जाता है। और मान लिजिए की आप मार्च माह की फीस इस स्कूल के रूल के हिसाब से गत बीते हुए महिनों में भर चुके है और यदि मार्च माह में किसी और माह की फीस आपको भरनी है और आप लेट हो गये तो 70 से 50 रूपये तक लेट फीस चार्ज वसूला जाता है। हर तीन माह में परीक्षा फीस, और हर टेस्ट में लगभग हर बच्चे के परीक्षा परिणाम में कॉपी पर लिख कर भेजतें हैं वेरी पूयर, 10 में से 00। हम अभिभावक लोग ये खून का घूँट इसलिये पी लेते हैं ताकि हमारे बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पैसों की बजह से बर्बाद न हो लेकिन कभी कभी ये इस तरह का शोषण हमारे घर और मन की शांति भंग कर देता है।
इस लेख को पढ़ कर आप ये ना सोचे कि मेरी इस स्कूल से कोई जाति दुश्मनी है मै तो अपने अनुभवों से भोपाल में स्कूलों द्वारा कैसे गरीब अभिभावकों का खून चुसा जा रहा है बताने की एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ।

on 29 june12
रामकृष्ण मिशन का आश्रम प्रेस कॉम्प्लेक्स एमपी नगर मे हैं होशंगाबाद मेनरोड पर है वहाँ पिछले साल स्टेट बैंक आॅफ इंडिया द्वारा इनके द्वारा जो स्कूल अवधपुरी बीएचईएल में संचालित किया जाता है के लिये एक स्कूल बस दान दी गई थी जो केवल आश्रम में ही खड़ी रहती है। स्कूल से 6 कि.मी. दूर और जो स्कूल के बच्चे हैं वे अपने साधन से ही स्कूल आते हैं। इसके पहले जो 9 लाख रू. का दान दिया गया था एसबीआई द्वारा बच्चों के लिये लाइब्रेरी बनवाने के लिये इसी स्कूल को उस लाइब्रेरी का लाभ किसे मिल रहा है या बनी भी नही पता नही। इनका जो हेड है जिन्हें स्कूल का प्रिंसीपल महाराज कहता हैं उससे मिलना किसी वीआईपी से मिलने के बराबर है। इस आश्रम द्वारा संचालित स्कूल द्वारा टीसी के लिये 1500-2000 रू की वसूली की जाती है। राम और कृष्ण के नाम पर ये लोग भोपालवासियों को लूट रहे हैं।


29 may 2014 bhaskar

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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

सर से गुजरती शिक्षा मंहगाई

आज से स्कूलों का बिजनेस चालू हो गया है। वे स्कूल जो बड़े-बड़े ट्रस्टों द्वारा संचालित किये जाते हैं जो कम दाम में अच्छी शिक्षा का दावा करते हैं जिन्हें हमारे देश के कोने कोने से और विदेशों से भरपूर वित्तीय सहायता मिलती है। जिनमें बच्चों को पढ़ाना ऐसा लगता है जैसे कि किसी हाउसिंग लोन की ईएमआई भर रहे हों। ये स्कूल इस शिक्षा सत्र में कमाने का नये नये बहाने ढँूढ़ रहें हैं जैसे बहुत से स्कूल कमाने के लिये किसी न किसी तरह बच्चों की यूनिफार्म चेंज कर या किताबों का पब्लिकेशन चेंज कर अभिभाववकों को उसे खरीदने को कह रहें हैं । और हद तो तब हो जाती है जब आपका बच्चा केजी 2 से पहली क्लास में जाता है तो ये स्कूल संचालक रिएडमिशन चार्ज वसूल रहे हैं। आप अपने आस पास की यूनिफार्म और स्कूल की किताबों की दुकानों पर भीड़ देख इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं।
कुछ दिन पहले न्यूज पेपर्स में ये समाचार छपा था कि कलेक्टर के आदेश हैं कि स्कूल अभिभावकों को इन यूनिफार्म और किताबों को किसी पर्टिकुलर जगह से खरीदने के लिये मजबूर नही कर सकते किंतु इस आदेश का असर कहीं भी देखने को नही मिल रहा हैं। कृपया प्रशासन से निवेदन हैं कि इन स्कूलों को मनमर्जी से हर वर्ष यूनिफार्म और किताबों का पब्लिकेशन चेंज करने का विस्तृत कारण बताने का आदेश जारी करना चाहिये और इनसे ये भी पूछना चाहियें कि ये उन किताबों को बच्चों को कैसे रिकमंड कर रहें हैं जिन पर प्राइस के दो-दो स्टीकर्स एक के ऊपर एक लगे होते हैं और दोनों में कम से कम 75प्रतिशत का फर्क होता हैं। और वे स्कूल जो अनुदान पाकर गरीब बच्चो को शिक्षा देने का वादा करते हैं वे केवल झुग्गी झोपड़ी ऐरियों में ही सीमित हैं उन्हें कौन बतायें कि गरीब केडेगरी के कुछ बच्चें शहर की पाश कॉलोनियों में भी निवास करते हैं। और इन्हें ये भी सोचना चाहिये कि मिडिल क्लास के बच्चे भी तो गरीब की ही केडेगरी में आते हैं भले ही शासन उन्हें अमीर समझ रहा हो। हमारे शहर में जिस अनुपात में नई नई कॉलोनियां बन रही हैं उस अनुपात में स्कूलों का प्रतिशत 5प्रतिशत भी नही दिखाई देता। गांवों में तो आपको स्कूल मिल जाते हैं पर शहर में यदि आप किसी नई कालोनी में रहते हैं तो आपको अपने बच्चें के लिये स्कूल ढंूढने में निराशा ही हाथ लगेगी।

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