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बुधवार, 18 जनवरी 2017

धूर्त लोगों का भला सोच समझ कर करें

हमें किसी की सहायता या भला उसकी ​दीन हीन दशा देखकर तो करना ही चाहिये लेकिन अपना समय खराब कर किसी का भला बहुत बहुत और भी बहुत सोच समझ कर उसके चरित्र और उसके व्यवहार को कुछ समय तक निगरानी कर उसका का बडा भला करना या नही करना है इसका निर्णय करना चाहिये। मै ये इसलिये लिख रहा हूं क्योकि मैने अपने कुछ संडे के अवकाश, पूरे 5 घंटे हर संडे एक बंदे को दिये ताकि उसकी जॉब लग सके उसे नि:शुल्क Training दी। आज से 6 साल पहले की बात है। लोग जब बरसात में अपने घर में होते थे तो मै हर संडे उसे कम्प्यूटर सिखाने निकल पडता था। आज ये हालात हैं कि वह वंदा जब भी कभी मिलता है दुम दबा कर नजरे बचा कर निकल जाता है।

रविवार, 1 जनवरी 2017

आप सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएं

आज मै यहां बहुत दिनों बाद लिख रहा हूं क्योकि मैने अपने ग्राफिक्स डिजाईनर की जॉब अक्टूबर 2015 में छोडकर, एक चाय की दुकान अपने घर के पास ही खोल ली है। पिछले 15—16 वर्षों से जॉब करते करते मुझे समझ आ गया कि भोपाल जैसी सिटी में ग्राफिक्स डिजाईनर के जॉब में सेलरी एक ​सीमित आंकडे तक ही मिल सकती है यदि अच्छी जगह जॉब मिल गया तो। पेरेन्ट्स का बेक सपोर्ट बिलकुल नही है तो सोचा कुछ रिस्क लिया जाये, फंड बिलकुल नही ​था। इसलिये एक बेकवर्ड कॉलोनी में सस्ती सी दुकान किराये पर ले कर चाय की दुकान शुरू की। पूरी जमापूंजी से छ: आठ माह घर का खर्च चलाया अब कहीं जा कर कुछ आमदनी होने लगी है। आगे की कहानी बाद में...
आज मै यहां दैनिक भास्कर के नबवर्ष 2017 अंक की कुछ खास बातें संजो रहा हूं मुझे तो इस में बहुत कुछ सकारात्मक लगा।
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