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शनिवार, 29 जून 2013

गड्डों में सडकें

Road conditions in Bhopal

नये भोपाल की काॅलोनियों में और पुराने शहर में रोडों का हाल ऐसा है कि बच्चे और बुर्जर्गो की इन पर चलते हुये किडनी तक हिल जाती है लेकिन प्रशासन की कान पर जंू तक नही रेंगती। खाने से लेकर हगने तक पर टैक्स जनता दे रही है लेकिन रोडो पर न तो स्ट्रीट लाइट्स जलती हैं ना ही गडडे भरे जाते हैं हां नर्मदा पाईप लाईन का कार्य प्रगति पर है को शो करने के लिये वर्षा में भी घरों के सामने रात दिन खुदाई चलती है लेकिन भराई के लिये लोगों को नगर निगम के हाथ जोडने पडते हैं। भोपाल में जो रोडें है जहां से नेताओं की लालबत्ती गुजरती हैं उनमें किसी भी मौसम में गड्डे दिखाई नही देते क्या उन्हें स्पेशल इंजीनियर्स द्वारा बनाया गया है।

24 sept 2013



18 july 2013

28 june 2013

29 june 2013

29 june 2013

29 june 2013
3 july 2013
31 july 2013
29 july dbstar
29 july 2013 bhaskar
5 aug 2013


5 aug 2013

31 july 2013
31 july 2013



सोमवार, 10 जून 2013

रेलवे प्लेटफार्म पर MRP से ज्यादा रेट्स क्यों बसूले जाते हैं?

रेलवे प्लेटफार्म पर MRP से ज्यादा रेट्स क्यों बसूले जाते हैं? क्या ये रेलवे का कानून है तो यात्रियों पर थोपा जाता है . MRP चाय पर होता नहीं इसलिए चाय के नाम पर उबला हुआ पानी बेचा जाता है। ग्राहकों के लिए विज्ञापन रात दिन TV पर दिखा रहे हो एक विज्ञापन ऐसा भी बनाओ जागो रेलवे जागो!-



सोमवार, 3 जून 2013

अटल ज्योति अभियान को चिढ़ातीं ये चायनीज इमरजेंसी लाइट्स और चिमनियां

Atal Jyoti Abhiyan: A journey of light

कुछ दिन पहले बस के सफर में भोपाल के आसपास गांवों का नाजारा देखने को मिला । शाम का समय था सफर शुरू हुआ शाम ६:४५ से और खत्म हुआ रात ९ बजे जो देखने को मिला यहां बता रहा हंू। हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने अटल ज्योति अभियान चलाया है कि २४ घंटे बिजली दी जायेगी लेकिन मै प्रतिदिन भास्कर में देखता हंू भोपाल शहर में बिजली कटौती का समय ४-५ घंटे का क्षेत्रबार और कॉलोनी के नाम सहित प्रकाशित किया जाता है और कभी कभी मेरे घर पर भी इतनी भीषण गर्मी में भी २-३ घंटे बिजली गायब रहती है। लेकिन बहुत से गांव भोपाल और आसपास के जिलों में ऐसे हैं जो कि गूगल मेप में दिखाई नही देते वे केवल रोड के सफर में ही दिखाई देते हैं वहां शाम होते ही चायनीज इमरजेंसी लाइट्स जल उठती हैं हर घर में । और जो बेहद गरीब हैं वे केरोसीन की चिमनियों से काम चलाते हैं। इन गांवों में बच्चे कैसे परीक्षा की तैयारी करते होंगे भले ही इनके घर में टीवी और अन्य इलेक्ट्रिकल उपकरण हों वे सब अनुपयोगी हैं।




05 march 2015



27 april 2014 bhaskar




3rd JUNE 2013 BHASKAR BHOPAL
4 june 2013





4 june 2013

4 june 2013
9 JUNE 2013
18 june 2013
24 june 2013
14.11.13

21 april 15

भोपाल और हबीबगंज रेल्वे स्टेशन का आंखों देखा हाल

Mismanagement at Bhopal and Habibganj Railway Station
पोस्ट बहुत छोटी है लेकिन जो हाल देखा लिखने का मन किया क्योंकि शायद सोते हुये प्रशासन को कोई जगा दे।
हबीबगंज और भोपाल रेल्वे स्टेशन पर जो पार्किंग हैं वहाँ कोई भी गाड़ी पार्क कर सकता है चोर या कोई बुरा सोच वाला। कोई पूछने वाला नही। कोई भी व्यक्ति मनचाही गाड़ी पार्किंग स्थल से ले जा सकता है बस उसके पास पार्किंग की पर्ची और गाड़ी की चाबी होना चाहिये। ये जो पार्किंग हैं वहां कम से कम १००० गाडियां प्रतिदिन पार्क की जाती हैं। किसी प्रकार का कोई कम्प्यूटरीकृत कोई सिस्टम नही जबकि आये दिन न्यूज पेपर्स में न्यूज आती रहती है कि जो वाहन चोर गिरोह पकड़े जाते हैं वे अधिकतर रेल्वे स्टेेशन की पार्किंग में ही चोरी की गाडिय़ाँ पार्क करते थे आदि। अब मै एक सुझाव रेल्वे प्रशासन को देना चाहता हंू कि जैसा पार्किंग सिस्टम डीबी मॉल में है जिसमें की कम्प्यूटर पर एक-एक गाड़ी का वाहन नं. दर्ज किया जाता है साथ में सीसीटीवी कैमरे से वाहन लाने वाले का रिकार्ड भी कम्प्यूटर में दर्ज हो जाता है वैसा ही सिस्टम रेल्वे क्यो नही अपनाता। और ये पार्किंग वाले ऐसा लगता है केवल नोट छाप रहे हैं २४ घंटे । और भी अव्यवस्थाएं हैं जैसे भीषण गर्मी में आधा कि.मी. लम्बे प्लेटफार्म पर आप और हम ढंूढ़ते रह जाते हैं कहाँ वाटर कूलर का ठंडा पानी है। और ठंडे पानी की बोटल्स मिलती हैं वे ऊंचे दामों पर बेची जाती है प्लेटफार्म पर जैसे रेल्वे ने उन दुकानदारों को यात्रियों को लूटने का लायसेंस दे रखा हो। इतनी गर्मी में खाने पीने की चीजों की कोई जांच नही की जाती खाद्य विभाग द्वारा रेल्वे स्टेशनों पर जो कि बासे कूसे आलू और मैंदे से बनाया जाता है। टिकट खिड़कियों पर रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाये जाने का परिणाम नजर आता है बुर्जग महिलायें और पुरूष रेल्वे कर्मचारी यात्रियों की अनसुनी करते हुये बेहद सुस्त चाल से कम्प्यूटर चलाते हैं उनकी नजर केवल पहचान वाले टिकट खरीदार पर होती है। भले ही यात्री चिल्लाते रहें कि ट्रेन छूट जायेगी या यात्री बताये कि वह अपंग की श्रेणी में आता है या यात्री कहे की उसके पास चेंज नही हैं तो भी उन पर कोई फर्क नही पड़ता।
हाँ एक और बात पुराने भोपाल रेल्वे स्टेशन के ४ नं. प्लेटफार्म से होटलें दिखाई देती हैं जिनका पिछवाड़ा प्लेटफार्म की तरफ होता है उनमें से अधिकतर बहुत ही पुरानी हैं जिनमें पूरी तीन मंजिलों तक पूरी बिल्डिंग में पीपल और अन्य वृक्ष उग आयें हैं पहली नजर में ही होटल का पिछवाड़ा होटल की जर्जर हालत वायां करता है।
1-3 june 2013

1-3 june 2013

1-3 june 2013
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