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सोमवार, 30 जनवरी 2012

एक निर्णय जो लेते समय आपको सही लगता है

मै पिछले 2 महिनों से एक बुजुर्ग, मेरे घर से जो मंदिर दिखाई देता है उसके सामने से प्रात: निकलते हैं आज मैने देखा कि वे बिना हाथ जोड़े ही मंदिर के सामने से आगे बढ़ गए। मै सोच मै पड़ गया कि आखिर उन्होने अपना नियम क्यो भुला दिया अपनी श्रद्धा क्यो भूल गये। मैने अंदाजा लगाया कि जरूर घर की कोई परेशानी होगी जो आज भी इस उम्र में तनाव उन्हें प्रताड़ित कर रहा है।
कभी कभी हम मोह के कारण या प्रेम में पड़कर ऐसे निर्णय ले लेते हैं कि हमें ये महसूस होता है कि हम जो निर्णय ले रहे हैं वही सही है। आप किसी जेल में बुजुर्ग दम्पत्ति जो कि 60 की उम्र में जेल में लाये गये हैं देखकर क्या सोचेंगे अधिकतर मामले उन लोगों के होते हैं जिन्होंने दहेज के मोह और अच्छे खानदान की चाह में अपने बेटे को विवाह बंधन में बांध दिया लेकिन उनकी बहू ने उन्हें दहेज लोभी सिद्ध कर जेल पहँुचा दिया। कुछ बुजुर्ग दम्पत्ति घर पर ही जेल का अनुभव करते हैं क्योकि वे अपनी जिम्मेदारी और सम्पत्ति अपनो को दे चुके होते हैं और चाहकर भी कुछ नही कर पाते। न्यूक्लियर फेमली में अधिकतर पुरूष अपने गलत निर्णयों के कारण दुख भोगता है उसमें वह प्रेम विवाह का निर्णय भी शामिल होता है वह प्रेम में पड़कर अपनी प्रेमिका के केवल गुण ही देखता है बाकी दुर्गुण तो केवल शादी के बाद ही दिखाई देते हैं और यदि एकबार दुर्गुण निकालने की आदत पड़ गई तो एक नही, दो नही सैकड़ो दुर्गण पुरूष हो या स्त्री दोनों को अपने साथी में नजर आने लगते हैं। यहाँ दुख ये प्रेमी या बुजुर्ग अपने अत्यधिक मोह के कारण, अपनी जिम्मेदारी को त्यागने की जल्दी, शुकुन केवल अपने पुत्रों के साथ पाने के गलत फेहमी पाल लेने के कारण होता है। यदि हम अपनी प्रेमिका के साथ प्रेम मे पड़कर दिल के साथ थोड़ा दिमाग भी उपयोग करें जैसे के हम अपने प्रेमी या प्रेमिका के गुण के साथ-साथ उसके दुर्गण भी विवाह से पहले देखें और उसे स्वीकार करें यदि आपकोे प्रेम में अंधे होने के कारण दुर्गण दिखाई नही देते हैं तो अपने माता पिता की सलाह जरूर लें क्योकि उनसे ज्यादा आपका भला इस दुनिया में कोई नही चाहता तो ये कलह जो विवाह के बाद हमारा शुकुन छीन लेती है से बच सकते हैं यदि माता पिता की मर्जी से दहेज के लोभ में विवाह हो रहा हो तो आप अपनी जिम्मेदारी निभाते हुये ये तय करें कि जो जीवन साथी आपके जीवन में आने वाली है कहीं वह आपके माता पिता का बचा जीवन नर्क में न बदल दे। हमारे विवाहित जीवन में कलह का मुख्य कारण हमारी जबान होती है जो कि एक गऊ (गाय) के समान होती है यदि हमारा इस पर नियंत्रण नही होगा तो ये ऐसी हो जायेगी जैसे कोई गाय किसी खड़ी फसल के खेत में घुस कर फसल तबाह कर देती है और जिसके बदले में उसे भी अपमान मिलता है। यदि हम नही चाहते कि घर में कलह बढ़े तो हमें अपनी जवान से ऐसे शब्द न बोलें की जो हम भी दूसरों द्वारा नही सुनना चाहते।  जितनी जल्दी हो सके भगवान के ध्यान में जप में अपनी जबान को लगा दें। मीठा बोलें खासतौर से बच्चों से तो हमेशा ही। बच्चों को ये महसूस न होनें दें कि आपके पास कड़वे शब्दों का भंडार है। इसका फायदा ये होगा कि जब आप घर में अपने साथी से कड़वे शब्द कह रहे होंगे तो उस बीच बच्चों से बातें करते समय आपको मीठे शब्द बच्चों के बहाने याद आ जायेंगे।
बुढ़ापे में यदि हम अपनी जबानी की भांति ही बारीकी दिखायेंगे तो निश्चित ही दुख मिलेगा। मेरे गुरू जी ने कहा है कि हमें बुढ़ापे में मोटा मोटा देखना चाहिये हर बात में अपना दखल की उम्मीद नही रखना चाहिये क्योकि अब आपके घर में दूसरा मुखिया जो आपका बेटा है उसे बारीक देखने दीजिए। जरूरी नही कि घर के हर निर्णय में आप अपनी भागीदारी दिखायें आप यदि ये कहेंगें कि तुम लोग समझदार हो अपने अच्छे बुरे का निर्णय स्वयं ले सकते हो तो ये आपका बडप्पन होगा। यदि आपकी बहू अपने पति के साथ आपके साथ नही रहना चाहती तो उसे समय रहते स्वयं ही ये कह कर अलग रहने की सलाह दें कि जहां भी रहें खुश रहें उसकी खुशी में ही आपकी खुशी है आपका आशीर्वाद उसके साथ रहेगा।
  उम्रदराज हो जाने पर हमारा शरीर कमजोर हो जाता है लेकिन जबान कमजोर नही होती। हर बात में अपनी राय जाहिर करने से, राय साहब की पदवी हासिल करने की आदत से हमें बदले में यदि अपमान मिलता है तो हमें अपनी जबान पर परमात्मा का नाम बसा लेना चाहिये। और हर बात में टोकने और राय देने, अपने विचार अपने परिवार के सदस्य या अपने बहू बेटों पर थोपने से बचना चाहिये। परमात्मा का नाम अपनी जबान पर बसाने के लिये यदि हम अपनी जवानी से या अपने विवाह के कुछ साल बाद ही प्रयासरत रहेंगे तो घर में जो प्रतिदिन कलह का सामना करना पड़ता है से बच सकते हैं। जिस घर में स्त्री का सम्मान नही होता वह घर शांतिहीन हो जाता है महिलाओं को जबान पर काबू रख कर अपने पतिपरमेश्वर को क्रोध की ओर जाने से रोकना चाहिये ये महिलाओं के लिये सरल है यदि महिलाये माँ सीता, पार्वती के बारे में रामायण और अन्य गं्रथों के माध्यम से जाने तो वे पाऐगीं की उनमें कितना धैर्य का सागर था ऐसा धैर्य कि जो अटूट था कभी नही टूटा जब राम भगवान वन को जा रहे थे तो वे भी भगवान राम के साथ हो ली, लेकिन जब भगवान राम ने उन्हें वन में जाने के लिये लक्ष्मण को आज्ञा दी और लक्ष्मण ने वन में अपनी पिता समान बड़े भाई की आज्ञा के बारे में सीता माता को बताया तब भी उन्होंने कोई शिकायत नही की। आजकल पति पत्नी में ये होता है कि वे अपने बच्चों से ये कहते हैं कि तुम्हारी माँ ऐसी है या तुम्हारे पिता ये नही लाते बडेÞ कंजूस है आदि आदि। जब हम उम्र दराज होते जाते हैं तो हमारे बाल सफेद होते जाते है जो हमें ये इशारा कर रहे होतें है कि जैसे हिमालय के ऊपर वर्फ जमी होती है आपके सर पर भी वही वर्फ जम रही है इसलिये अब शांत होने की आदत डालें। अक्सर घरों में ये देखा जाता है कि जब घर में कोई मिलने वाला आता है तो बुजुर्ग बीच बीच में अपनी राय देने लगते हैं या अपने ही बच्चों के कमियों को चिल्ला कर बताने लगते है तब होता ये है कि पहले तो बेटा या बहू उन्हें ये कहते है कि बीच में न बोला करें और यदि आदत से मजबूर होते हैं तो फिर अपने ही बहू बेटों से अतिथि के सामने जोर से मना करने या डांटे जाने पर अपमानित महसूस करते हैं और कहते हैं कि हमारी तो इस घर में कदर ही नही इसलिये जैसे जैसे हम बुजुर्ग होते जाते हैं हमें आध्यात्म की ओर जाना चाहिये और अपने बेटे बहु पोते पोतियों को पवित्र ग्रंथो में जो मनुष्य जीवन को सफल बनाने के सूत्र दिये  गये हैं बताना चाहिये।
हमें अपने घर में छांछ भी कभी दही थी जैसे टीवी सीरियल को एक लिमिट तक ही देखने के लिये अपने घर की महिलाओ को कहना चाहिये ताकि हमारा घर उन सीरियल्स की प्रयोगशाला न बन पाये क्यों कि जो हम देखते है हम सोचते भी वैसा ही हैं। यदि हम किसी दिन भूत वाले सीरियल्स देखते हैं तो हमें अपने अच्छे खासे घर में भी डर लगने लगता है। इसलिये टीवी सीरियल्स देखते समय अपने विवेक ये सोचना चाहिये कि ये दिखाये इसलिये जा रहे हैं ताकि हमारा मनोरंजन हो। कुछ लोग तो अपने घर की कलह का हल तांत्रिकों के पास ढ़ंूढ़ने जाते है क्योकि वे तांत्रिक दावा करते हैं कि उनके पास हर समस्या का समाधान है आप ही सोचिये कि यदि उनके पास हर समस्या का समाधान होता तो वे अपनी कंगाली दूर कर चुके होते। सरकार उन्हे हायर कर चुकी होती जहाँ लोग भूखमरी और भूकम्प के दंश झेल रहे हैं के दुख दूर करने के लिये। मनुष्य जीवन में दुखो का जो चक्र चलता है उसे केवल परमात्मा ही दूर कर सकते हैं। यदि आपके घर में आंतरिक कलह चल रही हो तो अपने रिश्तेदारों और मित्रों को ज्यादा अपने घर के बारे में बताने से बचें क्योकि रोते हुये लोगों से लोग दूर रहना पसंद करते हैं। आपने देखा होगा कि जब चक्की जो पुराने जमाने में हाथ से चलाई जाती थी में वे अन्न के दाने पीसने से बचे रहते हैं जो उस चक्की के केन्दÑ पर चिपके रहते है वैसे ही हमे अपने गृहस्थ जीवन में परमात्मा को जानने की राह में आध्यात्म में लगे रहना चाहिये जिससे की हम इस जीवन में पीसने से बच सकें। यदि आप समय रहते अपनी अक्ल से पर्दा हटायें तो पाएंये की ये मनुष्य जीवन हमें परमात्मा की कृपा से 84 लाख योनियों को भोगने के बाद मिला है इसे ईश्वर के वंदों में न पड़कर अपने फ्री समय को परमात्मा से मिलने में लगाना चाहिये। ध्यान रहे कि आप आध्यात्म की ओर चलें ना कि कर्मकांडो में अपना समय व्यतीत करें। यदि आप कबीर, रहीम, तुलसीदास जी आदि के बारे में कुछ खोजें तो शायद इस ओर प्रवृत्त हों।
 
ूूबूढ़े हो या जवान सभी चाहते हैं कि कुछ ऐसा घर में आये कि घर में शांति हो हमें भी शांति मिले ऐसा मतलब पैसा अधिकतर लोगो यही सोचते हैं कि कहीं से सुख सम्पत्ति आ जाये और कष्ट मिटे तन का, शांति मन में आ जाये। जैसे हम घर बनाते है तो हम नल का कनेक्शन लेते हैं तब हम जल के लिये उस नल पर ही निर्भर रहते हैं इसी तरह हम मन और आत्मा की शांति के लिये बाहर के चीजों पर निर्भर रहते है जैसे दिमाग में तनाव होता है तो हम छुट्टियाँ लेकर घर वालों से पीछा छुड़ाकर हिल्स स्टेशन और पता नही कहाँ कहाँ भागे फिरते हैं लेकिन यदि हम थोड़ा सोचे कि यदि हम उस नल पर निर्भर न रह कर अपने घर में बोरवेल खुदवा लें तो हमें नल के कनेक्शन पर निर्भर नही रहना पड़ेगा। बोरवेल खुदवाने से आशय है हमें अपने अंदर शांति की खोज करनी होगी जो कि गुरू के द्वारा बताये गये ध्यान जप ज्ञान से ही संभव है। ध्यान रहे कि किसी तांत्रिक को अपना गुरू न बनायें। रोज धार्मिक चैनल्स देखें जो भी सत्संग वाले महात्मा या विद्वान ऐसी वाणी बोलते हों जो आपके अंदर तक उतरती हो उसे प्रतिदिन सुने जब आपको ये लगे कि यही वह सद्पुरूष हैं जिनके बताये उपाय और नियम आप अपना सकते हैं तो आप समझिये कि आपकी गुरू की तलाश यही खत्म होती है। पर आप ये न करें कि अपना घर बार छोड़कर आश्रमों और तीर्थ स्थानों पर परमानेंट रहने लग जायें हमें अपनी समस्याओं से भागना नही है हमें जागना है, इसी तरह हमें त्यागना नहीं है जागना है।
हमारी जो टोंड कसने की आदत या कमेंट करने की आदत होती है उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये ताकि किसी को बुरा न लगे चाहे वह परिवार का ही सदस्य क्यो न हो पति पत्नि आपस में इस बात का विशेष ध्यान रखें। एक उदाहरण आता है महाभारत में जब दुर्योधन पांडवों के स्फटिक के महल में भ्रमित हो गया था और गिर गया था तब भीम ने कहा था कि अंधे का बेटा अंधा और इसी बात पर द्रोपदी ने ठहाका लगाया था जिसके कि बहुत बुरे परिणाम निर्दोष लोगों ने भी भोगे। घर की महिलाये बुजुर्ग हों या बहू जब सत्संग में जाती हैं तो वे सत्संग तो सुनती हैं पर सत्संग में चुगली-चुगली खेलने लग जाती हंै मेरी सास ऐसी है, मेरी बहू ऐसी है आदि और घर आकर कहती हैं कि सत्संग में जाने से मन शांत नही हुआ होगा भी कैसे जब आपका पूरा ध्यान अपने घर की सास या बहू की बुराई करने में था।

  हममें से अधिकतर ये चाहते हैं कि हमारी ही घर में चले, मतलब कि आप जैसा चाहते हैं वैसा ही घर में हो और आप स्वर्ग जैसा आनंद अपने घर में महसूस करें। एक सरल की बात है कि यदि हमें स्वर्ग में जाना है तो सबसे आवश्यक शर्त है उसके लिये हमें मरना होगा, मरने ये मतलब नही कि हम सुसाइड जैसा प्राणघातक कदम उठा लें । मरने से मतलब है हमें अपने अहंकार को मारना होगा यदि हमारे परिवार के सभी सदस्य ये बात समझ लें तो कोई भी अपनी बात मनवाने के लिये घर में कलह नही होने देगा। अधिकतर पति सोचते हैं कि मेरी वाईफ मूर्ख है, पत्नि ये सोचती है कि मेरे पति भोलें है कोई भी उन्हें मूर्ख बना देता है तो वह ये चाहती है कि आप उसकी सलाह अनुसार कार्य करें इस तरह वह अपनी बात मनवाने की सोचती है और पति अपनी बात, क्योंकि दोनों की सोच एक दूसरे को मूर्ख समझने की होती है। घर में जो बुजुर्ग होते हैं वे भी यही सोचते हैं कि उनके पास पूरी जिन्दगी का हर तरह का अनुभव है जिनके कारण ही वे हमें हर बात में टोंकते हैं, राय देते हैं और हम सोचते हैं कि ये बिना कारण रायसाहब बनने की कोशिश करते हैं। चक्की के दो पाट में हमें नही पीसना है बल्कि चक्की के केन्द्र से सटे रहना है या ये कहें कि हमें अपनी गृहस्थी की गाड़ी के पहियों को एकसाथ एक ही स्पीड में तारतम्य बिठा कर शुकुन को पाना है स्मूथ लाइफ जीना है तो हमें एक धूरी की जरूरत पड़ेगी जिसे इंग्लिश में शायद एक्सिस कहते हैं जो दोनों पहियों से जुडी होती है और चक्की में पाटों में एक लकड़ी के रूप में चक्की का केन्द्र बन कर तो हमें उस धूरी को स्थापित करना होगा। आप सोचिये कि अधिकतर लोग मरते समय किसे याद करते हैं जबाव है परमात्मा को लेकिन परमात्मा की भक्ति न कर पाने का अधिकतर लोगों में पछतावा होता है क्योकि वे तो मरणासन्न हैं। हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास अभी भी शायद कम समय लेकिन भक्ति के लायक तो है। यदि हम अपने परिवार को कर्मकांड के अलावा आध्यात्म से जोड़े तो सभी परिवार के सदस्यों की टÞ्यूनिंग या तारतम्य एक दूसरे से हो जायेगा मतलब ये कि वे आध्यात्म की चर्चा करते समय एक दूसरे की बात को नही नकारेंगें क्योंकि वह तो उन्होंने गं्रथ में पढ़ा है। इसका मतलब ये नही कि हम थोड़ा पढ़ें और उस ज्ञान को घर के बाहर भी दूसरों पर बगहारने लगें हमें इस तरीके को केवल घर तक ही सीमित रखना है क्योंकि हमें सुख शांति घर में रहते हुये अपने अंदर पानीं है ये भी ध्यान रखना है कि हमें केवल कुछ ही दिन इस तरह की बाते जिससे की परिवार के सदस्यों का इंटरेस्ट इस ओर हो जाये तक ही सीमित रखना है जैसे गाड़ी एक बार किसी पटरी पर आ जाये तो स्वयं ही चलने लगती है ज्यादा मेहनत नही करना पड़ती। बुजुर्गों के लिये एक अलग तरीका है कि यदि आप बुजुर्ग हैं तो किसी ट्रेन यात्रा के बारे में याद करें जिस ट्रेन यात्रा को आपने 1 या 2 दिन में पूरा किया हो जैसे हम जब कोई रेल यात्रा करते हैं तो हम बहुत से सह यात्रियों जो कि हमारे सामने वाली सीट पर और हमारी साथ वाली सीट पर होते हें से एकदम हिलमिल जाते हंै यहाँ तक कि किसी में हमें अपनी बेटी या बेटा और पोते पोती या नाती नातिन तक नजर आने लगते हें, हम अपने भोजन या खाने पीने की चीजे कभी कभी तो मोबाईल भी शेयर करते हैं। लेकिन आप उस पल को सोचिये जब आपका स्टेशन आने को होता है तब आप अपना समान संभलकर अपने स्टेशन पर उतरने की तैयारी करते हैं वह सब मोह लगभग वही छोड़कर उतरना आपका लक्ष्य होता है उसी तरह हम इस दुनिया में अपनों के मोह को पूरा न भूल कर अपने मनुष्य जीवन के लक्ष्य को जो कि परमात्मा को जानने का है याद करने की ओर प्रवृत्त हों तो हम पूरी झंझठों से मुक्त स्वयं हो सकते हैं।



परिवार में मुख्य कलह का कारण अहंकार होता है अहंकार का छोटा भाई क्रोध है और इन दोनों भाईयों की बहन जिद है। पति पत्नी यदि दोनों अहंकारी हैं और यदि पत्नी हमेशा अपनी मनवाने की जिद पकड़ लेती है तो पति को क्रोध आना तय है। आपने देखा होगा कि जब महिलायें डाक्टर के पास भी जाती हैं तो भी लगातार बाते ही करती रहती है तब डाक्टर उनकी इस आदत से निजात पाने लिये उनसे कहता है कि कृपया अपनी जीभ बहार निकालें और जब तक मै आपका चेकअप न कर लँू दवाई न लिख दँू जीभ बहार ही रखना । हमारे मस्तिष्क पर क्रोध कनपटी से आता है जब क्रोध कनपटी पर हो उसी समय तुरंत अपनी जीभ को नियंत्रित कर परमात्मा का नाम स्मरण कर उस क्रोध को कनपटी से मस्तिष्क की ओर जाने से रोकना हमारे लिये हितकारी होता है। हमेशा याद रखें कि मस्तिष्क शीतल होता है तभी चेतना पूर्वक कार्य करता है इसलिये अपने हित में हमेशा क्रोध और डर के समय अपने दिमाग को ठंडा रखें। बुजुर्ग व्यक्ति ये याद रखें कि भले ही पूरी नीम का पेड़ कड़वाहट से भरा हो तो भी उसका पका हुआ फल मीठा होता है और कच्चा फल भविष्य में निश्चित ही मीठा होगा इसलिये उम्र के इस पड़ाव में हमें मीठा व्यवहार ही रखना चाहिये भले ही हम पूरी जिन्दगी क्रोध करते आ रहे हों। याद रखें कि हमारा मन एक कल्पवृक्ष की भांति व्यवहार करता है यदि हम क्रोध में आकर किसी के विषय या अपने लिये बुरा सोचते हैं तो बुरा ही होता है और क्रोध में तो पूरा हमारा ज्ञान धरा का धरा ही रह जाता है। ये याद रखें कि ज्ञानी का पतन हमेशा क्रोध से ही होता है। हमारे मन की एक विशेषता है कि हम अपने पारिवारिक कलह या तनाव से परेशान होकर यदि नकारात्मक सोचते हैं तो पूरा मन उदास होकर कुछ भारी गलत सोच बैठता है जिसके परिणाम हम प्राय: न्यूजपेपर में समाचार के रूप में पढ़ते हैं। और यदि मन पारिवारिक सुखी जीवन में यदि सकारात्मक सोच में होता है उस समय पूरा परिवार हमें प्यारा लगता है हम सकारात्मक की ओर पूरे जोश से अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं। यदि हमारे परिवार में कोई ऐसा है जो सालों से रोज समझाईस देने से भी नही सुधर रहा है तो ये मानकर उसे हमेशा इग्नोर करें कि वह सुधरना नही चाहता और ये परमात्मा की इच्छा माने कि परमात्मा नही चाहता के आप उसे सुधारने में अपना कीमती समय बर्बाद करें उसी समय को घर के बाहर ठंडे दिमाग से अपने कार्यस्थल या अपने बिजनेस में व्यय करें। और बुजुर्ग आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करनें में।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

फोटोशॉप में फान्ट में फायर इफेक्ट डालें Fire Text Effect in Photoshop

सबसे पहले एक ट्रांस्पेरेंट लेयर खोलें
अब इस लेयर को ब्लेक कलर से फील करें देखें चित्र 1
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अब इस ब्लेक लेयर पर टैक्स्ट टूल की मदद से आग लिखें या इंग्लिश में फायर लिखें (चित्र 2) टैक्स्ट का कलर पीला रखें। और अब कंट्रोल टी (Ctrl+T) की मदद से टैक्स्ट को एन्टी क्लोक वाइज -90 डिग्री घुमा दें।

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अब चित्र 3 व 4 के कमांड दें जिसमें कि विंड इफैक्ट डाला गया है। अब कंट्रोल के साथ एफ की (Ctrl+F) x3 (times) दबाएँ जिससे कि ये इफैक्ट रिपिट होकर टैक्स्ट पर एप्लाई हो।

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अब चित्र 5 के अनुसार व्लर कमांड दें

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अब चित्र 6 के अनुसार लिक्यूफाई कमांड की विंडो में ब्रश की मदद से आग की लपटें बनाने का थोड़ा सा प्रयास करें देंखें चित्र 7

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अब चित्र 8 के अनुसार आग की लेयर पर राइट क्लिक कर ब्लेंडिंग आॅप्शन चुने और विंडो खुलने पर चित्र 9 की तरह आप्शन सेट कर ओके करें

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अब कंट्रोल टी की मदद से टैक्स्ट को 90 डिग्री पर वापस सीधा करें और देंखें की आग का इफेक्अ (Fire Effect) आपके फांट पर आ चुका है

Final Result

एक अच्छी सीख

एक अच्छी सीख  
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मंगलवार, 17 जनवरी 2012

अपनी मानसिक शांति को किसी के द्वारा स्वयं से दूर न होने दें।

 जब हम सत्संग सुनने पंडाल जहाँ सत्संग हो रहा होता है, जहाँ हमारे गुरू की अमृतवाणी बह रही होती है उस पंडाल में जाते हैं तो हमें अधिकतर अपने जूते-चप्पल अपने पास रखकर बैठने होते है ताकि कोई उसे चुरा न ले जाये। लेकिन इसका एक ओर फायदा होता है कि इन जूते-चप्पलों को देखकर तनाव भी अधिकतर हमसे दूर रहता है चाहे वह हमारे फैमली मेम्बर जो हमारे साथ आये के रूप में क्यों न हो। सत्संग पंडाल में हमारी पत्नी जिसका घर में और हर जगह मुँह चलता रहता है भी चुप रहती है, बच्चे भी अनावश्यक डिमांड नही करते। क्या पता ये उन जूते-चप्पलों से डर कर इस तरह का व्यवहार करते हों। यही तरीका यदि हम घर में अपना लें तो शायद हम घर में भी अपने गुरू का सत्संग शांति पूर्वक सुन सकते हैं। ये तो हुआ व्यंग पर इस व्यंग के माध्यम से मै आपको ये बताना चाहता हूँ कि जब हम जीवन से घबरा कर, तनाव के कारण अपने अस्तित्व के उद्देश्य को जानने, सुखी होते हुये शांति की तलाश में सत्संग में जाते हैं तो हम क्यो इस सत्संग के मध्य किसी का हस्तक्षेप पसंद करें। शांति एक ऐसी चीज है जो भगवान के शरण में ही मिलती है जिसे हम ध्यान, आध्यात्म में परिश्रम कर पाते हैं। परिश्रम के आशय हमारा प्रात: नियम पूर्वक समय पर जल्दी उठकर प्राणायाम, ध्यान, जप से और हमारे मन को नियंत्रित करने से है। शांति बड़े बड़े धनी और राजा महाराजाओं और नेताओं को भी नसीब नही होती, कुछ मात्रा में मिलती भी है तो इच्छाओं और लोभ के शमन को लम्बे अंतराल तक अपनी आदत में लाने पर मिलती है। अब आप ही सोचिये कि आपकी इस कीमती शांति को कैसे कोई अपने ओंछे व्यवहार, मुँह चलाने की आदत से भंग कर सकता है। इसलिये हमें अपनी इस शांति की निरंतरता के लिये जब हम आध्यात्मिक क्रियाओं में घर में व्यस्त हों तो अपने फैमली मेम्बर से समझाते हुये उसके हानि के कारण उत्पन्न क्रोध और तनाव का हवाला देते हुये उनको ये कहे कि कृपया जितनी देर आप ध्यान और सत्संग करें ये मेम्बर आपकों स्वयं की आदतों पर काबू रख कर सहयोग करें। ये उदाहरण आप अपनी फैमली के मेम्बर्स को बता सकते हैं : जैसे आपको बचपन में क्लास में पढ़ाई के समय शोर करने पर दंड मिलता था जो कि लीगल होता था क्योकि आपने अन्य पढ़ाई में रत विद्यार्थियों को डिस्टर्व किया था।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

व्यथा को कम करें व्यवस्था से

मै अपने आॅफिस से पहले अपने ठीये पर चाय पीने के लिये प्रतिदिन की तरह रूका तभी एक पुराना मित्र वहाँ मिल गया हाय हलो के बाद बातों ही बातों में ध्यान दिया कि मित्र की आँखें लाल दिखाई दे रही थी जैसे कि वह रातभर सोया न हो तो मैने पूछ डाला क्या बात है भाई रात भर सोये नही क्या? तब मित्र बोला नही यार ये जो हाथ पिछले हफ्ते टूट गया था कल अचानक देर रात बहुत दर्द करने लगा जिसके कारण मै सो नही पाया तब मैने कहा कि दर्द निवारण गोली खा सकते थे तब वह मित्र भावुक होकर बोला क्या करूँ यार मेरी वाइफ ने वह दर्द निवारक गोलीयाँ जो कि बहुत महँगी थी पता नही कहाँ रख कर भूल गई चंूकि रात बहुत ज्यादा हो गई थी इसलिये मुझे किसी मेडिकल स्टोर का इतनी रात सर्द मौसम में खुली होने की उम्मीद बहुत कम नजर आई इसलिये मैने रात भर दर्द सहा और सो नही पाया। तब उसने अपनी वाइफ की एक अजीब आदत के बारे में अपना दुखडा सुनाया कि मै अपनी पत्नी की भूलने और लापरवाही के कारण बहुत परेशान रहता हूँ कभी कभी तो वह पूरा राशन खत्म होने पर भी मुझे इंफोर्म नही करती जब उस चीज की आवश्यकता पड़ जाती है जैसे रोटी बनाने के समय वह कहती है आटा खत्म हो गया, चाय बनाते समय कहती है चाय पत्ती खत्म हो गई, जब मेरा आॅफिस आने को समय होता है और मै अलमारी में प्रेस किये हुये कपड़ो को तलाशता हूँ तो वह कहती है कि वह धुल चुके हैं लेकिन अभी प्रेस होना बाकी है फिर दूसरे दिन भी वही बहाना। इसके आगे उसने ये भी बताया कि इसके भुलने की आदत के कारण मुझे अपने माता पिता से भी कभी कभी माँफी मंगनी पड़ती है। जैसे एक दिन मेरे पिता जी ने फोन किया कि जो अपना नया घर है उसकी चाबी वो लेने आ रहें है निकाल कर रखना मैने अपनी वाइफ को बोला तो वह बोली निकाल कर रख ली है आयेंगे तो दे दूगीँ और मै बेफ्रिक होकर आॅफिस आ गया। तभी मेरे पिता को कॉल आया कि बहू पिछले आधे घंटे से चाबी ही ढंूढ रही है। और मुझे वापिस घर आना पड़ा चाबी ढंूढने के लिये। उसने आगे बताया कि कभी कभी तो वह बच्चों को खाना और नहलाना में लापरवाही बरतती है बच्चों को शाम को 4 बजे नहलाती है।
तब मैने उससे पूछा कि वह क्या माता पिता से अलग रहता है तब उसने बताया कि मेरी वाइफ की इन आदतों के कारण मेरे माता पिता ने हमें अल्टीमेटम दे दिया कि अपनी आदत सुधारों नही तो अलग रहों तब भी मेरी पत्नी पर कोई असर नही हुआ और अब हमें अलग रहना पड़ रहा है पहले मेरे माता पिता सहते थे अब मै अपनी पत्नी की इस भूलने की आदत को सह रहा हूँ।
तब मैने उसे मैने एक सुझााव दिया कि जैसे एक कबाड़ी वाला होता है जिसे किसी चीज को कोई वैल्यू नही होती जिसे वह केवल दोबारा बेचने तक ही सीमित रहता है और उस कबाड़ी की दुकान में हर चीज इधर उधर पड़ी रहती है यदि जरूरत के सामान का खरीदार वहाँ जाता है तो उस खरीदार को ही जरूरत की चीज ढंूढनी पड़ती है ऐसा ही हाल तुम्हारे घर का है। पहले तो अपनी वाइफ को यह समझाओं कि अपने घर को कबाड़ी की दुकान की तरह कबाड़खाना न बनायें। दूसरा यह कि वह धीरे धीरे अपनी आदत में सुधार करें क्योकि जिस घर में साफ सफाई और हर चीज सलिके से हो वहाँ लक्ष्मी निवास करती हैं। यदि हम आँख बंद कर भी कोई सामन किसी अलमारी में लेने जायें तो वह उस अलमारी में उस वस्तु के तय स्थान पर मिले। बड़ी बड़ी कम्पनियाँ तो इस तरह की व्यवस्था बनाने में लाखों रूपये खर्च करती है। तुम्हे भी धैर्य रखकर और बार बार अपनी पत्नि को समझाकर यह व्यवस्था बनानी होगी। इस तरह तुम्हारी व्यथा व्यवस्था के माध्यम से कम हो सकती है।
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