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शनिवार, 10 मार्च 2012

इतना ही नही कितना ही

आपने ध्यान दिया होगा कि जब आप अपने युवास्था या जवानी के दिनों में जिम में या कसरत करने अखाड़े में जाते थे तब आप वहाँ अनेक उस्तादों 
या वजन उठाने वालों को देख कर ये सोचते थे कि मै तो इतना वजन उठा ही नही सकता। और यही से आप अपनी सीमा तय कर अपने अनुसार कम वजन की कसरत या एक्सरसाइज कर वापस अपने घर की ओर रूख करे लेते थे कुछ दिन बाद आपका जिम से मन भर जाता था और आप उसे अनियमित तरीके से स्वयं को हीन भावना से ग्रस्त कर जिम जाना छोड़ देते थे। लेकिन आज के समय की बात करें तो हर एक मार्डन जिम में एक इंस्ट्रक्टर या गाइड होता है। भले ही आप उससे ये कहें कि आप फलां कसरत या एक्सरसाइज नही कर सकते, फलां किलोग्राम का वजन नही उठा सकते फिर भी वह आपको कुछ ही महीनों में इतना ट्रेंड कर देता है कि आप दूसरों की नजरों और अपनी नजरों में एक सफल एक्सरसाइज करने वाले और अपनी पूर्व उम्मीद से भी अधिक वजन उठा सकते हैं।
एक उदाहरण और है जैसे एक बार एक मेंढ़क कुंए में होता है और एक हंस थक कर उस कुंए की मेढ़ पर आकर बैठ जाता है दोनों में वार्तालाप होता है तब मेंढ़क अपने कुंए की प्रशंसा करता है और उसे बताता है इसमें इतना पानी है जो कि उस हंस ने कभी नही देखा होगा तब हंस उसे समुद्र के जल की अनंत सीमा के बारे में बताता है तब वह मेंढ़क कल्पना करता है कि आखिर समुद्र में पानी कितना होगा। वह कुंए में जगह जगह उछल उछल कर हंस से पूछता है कि इतना पानी होगा समुद्र में हंस कहता है नही इतना नही, फिर मेंढ़क पूरे कुंए को  उछल उछल कर नाप देता है लेकिन फिर भी हंस कहता है यह पानी तो समुद्र के पानी की बराबरी नही कर सकता तब वह मेंढक उसे झूठा समझ कर उसे मूर्ख बनाने वाला समझ लेता है और उसकी बातों को ध्यान नही देता।
एक और उदाहरण लेते हैं ताकि हम समझ सकें। हममें से अधिकतर लोगों ने एक कहानी सुनी होगी कि एक बार एक बाज पक्षी का बच्चा पेड़ से गिर कर घायल हो जाता है तब उसे एक किसान द्वारा एक मुर्गी के बाड़े में छोड़ दिया जाता है कि कम से कम उसकी देखभाल तो होगी वह उस मुर्गियों के बच्चों के साथ रहकर दाना खाना, डरडर कर जीना और बाज पक्षियों को देखकर अक्सर जान बचाकर भागना सीख लेता है उसे अपने बाज होने का ज्ञान नही होता वह पंख होते हुए भी मुर्गियों की भांति केवल अपने पंखों को उछलने कूदने में ही उपयोग करता है।
इन तीन उदाहरणों के माध्यम से हम ये समझें कि हमें अपने जीवन में एक सद्गुरू की तलाश करनी होगी जो हमें हमारी परिस्थियों से ऊपर उठकर सोचने, समझने, अपने ज्ञान को बढ़ाने का मार्ग बताए, हमें गाइड करे हम अपनी क्षमताओं को कुंए की दीवार में कैद न करें। सद्गुरू ही है जो हमें हमारी छिपी हुई शक्ति का ज्ञान करा सकता है। ताकि हम आगे से ये न कहें कि बस हम अपनी जीवन में इतना ही कर सकते हैं बल्कि ये कहें कि हमे कितना ही कर सकने की क्षमता विकसित कर सकने की ओर अग्रसर हो चुके हैं। एक बात का ध्यान रखना है कि हमें किसी और लोगों की बातों में नही आना है जैसे बहुत से लोग तांत्रिकों और साधुओं के चक्कर में आकर कहते हैं कि फलां साधु या बाबा मनोकामना पूर्ण करते हैं। ताबीज देते हैं और पता नही क्या क्या करते है लेकिन अपने लिये धन नही प्रकट कर पाते । हमें ऐसे आध्यात्मिक गुरू की तालाश करना है जो हमें अपनी वर्तमान परिस्थिति में रहते हुए अपने ज्ञान पूर्ण प्रवचनों और योग विधियों से तथा हमें यम, नियम और आसन, प्रणायाम और ध्याान के जरीये हमें अपनी गलत आदतों से स्वयं निकलने का रास्ते का अनुभव कराये। जिनकी बातें सुनकर हमारी आत्मा या दिल में श्रद्धा के भाव जागें। लेकिन हमें एक बात गांठ बांध लेनी होगी कि हम सद्गुरू से किसी मनोकामना या ढेर सारा धन कमाने की विद्या की उम्मीद न करें। जब हमें सद्गुरू मिल जातें हैं तो हमें स्वत: ही ये अनुभव हो जाता है कि अभी तक तो हमने काली अंधियारी रात में अपना जीवन व्यतीत किया अब एक सुबह की किरण निकलने ही वाली है। सद्गुरू ही हैं जो हमें यह बताते है कि धनलक्ष्मी के साथ साथ हमें भोगलक्ष्मी के लिये भी अपने आपको तैयार करना पड़ेगा, अपने शरीर रूपी आत्मा के रथ को स्वस्थ रखना पड़ेगा। हम मनुष्य योनि में धन कमाने की मशीन की तरह जीवन व्यतीत करने नही आयें हैं। ऐसा न हो कि हम ये सबकुछ अपने गुरू के ऊपर ही छोड़ दें कि वे ही सबकुछ करेंगे कुछ संकल्प हमें भी लेने होंगें जो गुरू के प्रवचन और विधि हैं उन्हें पूरी ईमानदारी से फॉलो करना होगा। इस कहानी के माध्यम से हम ये समझ सकते हैं। हम लोगों ने एक कहानी अक्सर पढ़ी है सुनी है कि एक बार एक चूहा बिल्ली से डरकर भागते हुए एक साधु के शरण में पहँुच जाता है और साधु को उस पर दया आ जाती है। साधु अपने तप के बल से उसे बिल्ली बना देता है। फिर वहीं बिल्ली बना चूहा कुत्ते के डर से फिर साधु के पास आता है इस बार साधु उसे शेर बना देता है। वही शेर साधु को मारने के लिये छल्लांग लगाता है तो वह साधु उसे दुबारा अपने तप के बल पर चूहा बना देता है । लेकिन इस कहानी में अब समयानुसार परिवर्तन आ गया है। कहानी के अंत में वही चूहा बना शेर दूसरे बडेÞ शेर के डर से दुबारा साधु के पास आता है और प्रार्थना करता है कि उसे शेर से बचायें तब वह साधु उसे ये कहते हुए दुबारा चूहा बना देते हैं कि तुम शेर बन कर भी कुछ नही कर सकते क्योंकि तुम्हारा दिल तो चूहे का है या जब तक कि तुम्हारा चूहे का दिल नही परिवर्तित होगा। सद्गुरू की शरण में इसका जस्ट उल्टा होता है। गुरू हमें शेर या कुत्ता या बिल्ली नही बनाते बल्कि मनुष्य रहते हुए ही हमारे हृदय को परिवर्तन की ओर अग्रसर कर देते हैं। हमें अपनी गुजरी हुई लाईफ एक मूर्खतापूर्ण व्यतीत किया हुआ जीवन प्रतीत होता है। हमें ये लगने लगता है कि विवेकपूर्ण और ज्ञान की ओर प्रवृत्त जीवन तो अब शुरू हुआ है। गुरू की महिमा के यदि हम संत कबीर के लिखे दोहें पढ़े तो हमें गुरू की महत्ता का ज्ञान हो जायेगा। सद्गुरू हमें अपने अंदर की ओर प्रवृत्त करते हैं जबकि हम अब हम केवल दुनिया की ओर भाग रहे होते हैं जैसे एक हिरन अपनी नाभि से आती कस्तूरी की सुगंध के लिये यहाँ वहाँ भटकता रहता है लेकिन उसे ज्ञान नही होता कि कस्तूरी तो उसही के अंदर है। ध्यान रहे कि हमें ऐसे लोगो और प्रवचकर्ताओं से बचना है जो मरने के बाद ही सुख की बाते करते हों। हमें ऐसे गुरू की तलाश करनी है जो हमें जगतसत्यं राह बताते हुये हमें अपने इस मनुष्य जीवन को बेहतर तरीके से जीने और इसी जन्म में परमात्मा से संपर्क बनाने की विधि बताते हों।
   
हममे से अधिकतर लोगों ने यह अनुभव किया होगा कि कभी कभी हम कोई कार्य पूर्ण बुद्धिमानी से करते हैं लेकिन अंत में हमें उस कार्य में घाटा होता है वह कार्य सफल नही होता या हम अपने जीवन में वापस वहीं आ जाते हैं जहाँ से हमने अपनी प्रगति की शुरूआत की थी और हम पुन: 5-10 वर्ष स्वयं को पीछे को पाते हैं। हम अपने रात-दिन का चैन गवां कर माया के पीछे भागते हैं फिर भी हम दूसरों से स्वयं को कम ही पाते हैं जिम्मेदारी बढ़ने के साथ साथ तनाव हमें अवसाद ग्रस्त कर देता है। बात-बात में क्रोध, हाथ पैर कांपना, बैठे-बैठे पैर हिलाना, अकेले में बड़बड़ाना  या शाम होते ही निराश और अकेलेपन में दुखभरी पुरानी बातें सोचना आदि। किसी खास रिश्ते के कारण चिंता, तनाव पाल बैठते हैं। कुछ हजार रूपये की नौकरी के लिये अपने जीवन को नर्क में परिवर्तित कर लेते हैं, यह तय करके कि हमें इससे अच्छी नौकरी मिल ही नही सकती। रात दिन टीवी में खून खराबे वाली न्यूज, सास बहू, भूत प्रेतों की के डारावने के सीरियल देख देखकर हम अपने अंदर तनाव, भय, शोक, रोग, और चिंता रूपी भयानक आग को और बढ़ाते जाते हैं। प्रतिदिन मूवी चैनल्स पर बार बार हर माह एक ही फिल्म देखदेख कर अपने दिमाग को भटकाना जिनमें कि फिल्म कम विज्ञापन ज्यादा आते हैं जो हमारी इच्छाआें को और बढ़ाते हैं। जिनसे हमें रतीभर भी कोई फायदा नही होता सिवाय अपना खून जलाने के, हीन भावना और फालतू खर्च कर अपने को फकीरों की लाईन में खड़ा करने के। आज से ही हमें इन सब चीजों और आदतों की पकड़ को कमजोर करना है जो हमें पकड़ कर धीरे धीरे नर्क की ओर ले जा रही हैं। पढ़लिख कर और दूसरों की आदतों को अपनाकर हम बुद्धिमान तो हो चुके हैं लेकिन हम इस बात से अनभिज्ञ हैं कि ये सब चीजें बुद्धिमानों की ही देन है जो हमें भ्रमित करने के लिये टीवी पर दिखाई जा रहीं हैं, पैसा कमाने के लिये। हमें बुद्धिमान होने के साथ साथ अपने अंदर एक समझ-बूझ और सूझ की आवश्यकता है जो हमें गुरू के द्वारा प्रदान आध्यात्मिक ज्ञान से ही आती है। समझ ही है जो हमारे भले के लिये हमें नेगेटिव एप्रोच से पोजिटिव एप्रोच की ओर ले जाती है अर्थातÞ किसी कार्य की ओर प्रवृत्त होने से पहले बुद्धि के बाद समझ यह तय करती है कि फलां चीज या आदत हमारे शरीर और जीवन को क्षति पहँुचाएगी या लाभ। मान लिजिए कि हमारे पास कई एकड़ जमीन है और हमने उसे बिना तारों की बाउंड्री बनाये छोड़ रखा है जिसमें कोई भी आवारा पशु और कांटेदार पेड़ पौधे उगते जाते हैं। और कोई भी आकर अपना कचरा वहां फेंक जाता है। जमीन बंजर होती जाती है किसी भी तरह का छायादार-फलदार वृक्ष या फूल पौधे वहां नही है। यही हलात हमारे मन मस्तिष्क की है गुरू ही है जो हमें मन की जमीन पर तारों की बाउंड्री बनाने में हमें प्रवृत्त करता है ताकि इस मन रूपी जमीन पर केवल और केवल फलदार और फूलों के ही वृक्ष और पौधे रूपी विचार आयें। ताकि हम सद्कर्मों की ओर प्रवृत्त हों। गुरू के मार्गदर्शन में ही हम ये तय कर पाते हैं बुरी आदतें हमें नही पकड़े हुई हैं बल्कि हम उनको पकड़ कर रखे हुए हैं। गुरू के ही सानिध्य में हम पाते हैं कि अभी तक हम केवल बुरी आदतों की ओर प्रवृत्त हो रहे थे जबकि अच्छी और हमें शांति की ओर ले जाने वाली आदतें हम अपना सकते हैं जिनकी यहाँ भरमार है।
हमें अपना दृष्टिकोण अपने भले के लिये चेंज करना होगा या चिंता को छोड़ हमें चिंतन करना होगा कि हम क्यों लगातार एक ही तरह की बातें सोचते रहते हैं। एक उदाहरण है जिससे हमें इसे समझने में सहायता मिल सकती है-जैसे एक जमाने में एक विज्ञापन आता था कि एक महिला रोज अपने पति से नाश्ते के समय अपने सामने वाली पड़ोसन को कपड़े सूखने डालते हुए कहती थी कि देखो कैसे कपड़े धोती है सभी कपड़े गंदे ही रहते हैं धुलने के बाद भी। यह सुनकर पति चुप रहता था। यह क्रम प्रतिदिन चलता रहता था एक दिन पत्नी दो एक दिन के लिये अपने मायके जाती है और वापस आती है तब प्रात: उसी नाश्ते के समय वह पड़ोसन कपडेÞ सूखने डाल रही होती है लेकिन उसके कपड़े पहले की अपेक्षा ज्यादा चककीले और साफ नजर आते हैं तब वह पत्नी अपने पति से कहती है कि ये चमत्कार कैसे हो गया एक दिन में इसे तो कपड़े धोना नही आते थे तब पति उसे कहता है भाग्यवान मैने खिड़की के कांच तुम्हारी अनुपस्थिति में साफ कर दिये हैं इसलिये तुम्हे कपड़े चमकीले और साफ दिखाई दे रहे हैं। इस उदाहरण से साफ है कि जैसे हमारे विचार होते हैं वैसा ही हम दुनिया को देखते हैं। अपने अपने वर्तमान स्तर से हटकर कुछ विचारों और कुसंग को छोड़कर एक नये जीवन की शुरूआत करनी होगी। जो कि गुरू के सानिध्य में ही संभव है।
धार्मिक टीवी चैनल्स पर कुछ संतपुरूषों और महात्माओं के सत्संग आते हैं जिन्हें हमें रोज देखदेख कर ये तय करना होगा कि कौन बेवकूफ बना कर पैसा ऐंठ रहें हैं और कौन सचमुच ज्ञान की अमृतधारा बहा रहें हैं बिना किसी चार्ज के हमें चार्ज कर सकते हैं । और जिस संत पुरूष की वाणी आपके अंदर तक उतरे मानलिजिए आप की खोज पूरी हुई या हम अपने बुजुर्गो से भी अपने गुरू की खोज हेतु मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। गुरू ही हैं जो हमें अपने अंदर छुपी हुई शक्ति से अवगत कराने में   सहायता करते हैं। वह शक्ति जो असंभव को भी संभव होने के रास्ते बताती है। वैसे तो गुरू की महिमा के गान के लिये कागज और स्याही भी कम है मैने तो केवल आपको अपनी वर्तमान परिस्थिति से ऊबरने के लिये इस लेख के माध्यम से एक प्रयास किया है। आज से यह बात बार याद करें - उठ जाग मुसाफिर, रैन नहीं जो सोवत है। जो सोवत है वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है।
नया दौर फिल्म का यह गाना सुनें मो. रफी का गाया हुआ: आना है तो आ रह में, कुछ फेर नही है भगवान के घर देर है अंधेर नही.............................तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे, भगवान के इंसाफ पर छोड़ दे वंदे। खुद ही तेरी मुश्किल को वो आसान करेगा, जो तू नही कर पाया वो भगवान करेगा.......वंदे तेरे हर हाल पर मालिक की नजर है...आना है तो आ रह में, कुछ फेर नही है भगवान के घर देर है अंधेर नही.................बिन मांगे भी मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें.....संसार की सबसे बड़ी सरकार यहीं है................आना है तो आ रह में, कुछ फेर नही है भगवान के घर देर है अंधेर नही

यह तन बिष की बेलरी, गुरू अमृत की खान ।
शीश दियो जो गुरू मिले, तो भी सस्ता जान।।

जो तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साँंई तुझमे है, जाग सके तो जाग।।

माला फेरत जुग गया, गया ना मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।
                                                                     -संत कबीर के दोहे

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