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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

अब जीवन का लक्ष्य है कर्ज चुकाना

आएँ हैं तो जाऐंगे, राजा रंक फकीर।
खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाएंगे।
दुनिया है सराय, रहने को हम आये। आदि
हमने ये बचपन से लेकर आज तक सुना है यदि हम इसका मतलब दूसरों के लिये न निकाल कर अपने लिये निकाले तो हम अपने जीवन में कर्ज के बोझ से दबने से बच सकते हैं।
 हममें से बहुत से लोग पढ़ाई करते हैं डिग्रीधारी होकर एक अच्छी नौकरी के लिये रातदिन मेहनत करते हैं पहले ट्रेनी फिर परमानेंट नौकरी उसके बाद हम उत्तरोत्तर तरक्की करने की इच्छा से अच्छी से अच्छी सेलरी वाली नौकरी तलाशते हैं क्योंकि हम टार्गेट या लक्ष्य लेकर चलते हैं कि किस सेलरी अमाउंट में हम अपने और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं। हममे से अधिकतर लोग अपने भविष्य की चिंता अपने विवाह के पश्वात करते हैं, सभी आवश्यकताएँ तो पूरी होती रहती हैं लेकिन जब हम कोई मंहगा घर या कोई छोटे-मोटे बिजनेस के लिये लोन ले लेते हैं । पहले 2-3 साल तो हम लोन की ईएमआई या किश्तें तो बराबर चुकातें हैं लेकिन हमारी उम्र के साथ ही हमारी अच्छी सेलरी के लिये नौकरी चेंज करने की आदत पर रोक लग जाती है क्योंकि हम चाहकर भी अपनी जिम्मेदारियों के दवाब में कोई निर्णय लेने से पहले अपने बैंक बैलेंस या वेकअप को ध्यान करते हैं और जो लोग बिजनेस के लिये लोन ले लेते हैं यदि उनका बिजनेस नही चला तो भी उन्हें किश्तें तो चुकानीं ही हैं। यहाँ ये बात बात ध्यान रखें कि हम उनलोगों के बारे में बातें नही कर रहे जो लोन न चुका पाने के कारण सड़को पर आ गये हम यहाँ उन लोगों के बारे में बात कर रहें हैं जिनकी इच्छा पूरा लोन चुकाने की होती है लेकिन इस लोन चुकाने में उन्हे अपनी लाईफ एक वन-वे की तरह लगने लगती हैं जिसमें आप वापस नही मुड़ सकते, जब तक लोन की पूरी किश्तें न चुका दें। अधिकतर लोगों की विवाह पश्चात लाईफ अच्छी चलती है लेकिन हमारे आस-पास ऐसा माहौल होता है कोई मकान खरीद रहा है, कोई कार खरीद रहा है, कोई शेयर मार्केट में कमा रहा है, कोई अपने घर के लिये मंहगी चीजें खरीद रहा है और अधिकतर लोग तो ऐसे मिलते हैं जो हमेशा इसी बात का पता करते हैं कि आपने अभी तक कोई अच्छी मनी जनरेटेट बीमा पॉलिसी ली या नही। यदि आपकी सरकारी नौकरी है तब तो अब मैनेज कर सकते हैं लेकिन यदि आप किसी मध्यमवर्गीय परिवार से हैं तो इन सब चीजों में से किसी के लिये भी लोन लेकर कर आप पछतावा महसूस करते हैं।
लोन की किश्तें होती हैं 4 साल या अधिक से अधिक 10-20 साल तक अब आप ही सोचिये कि क्या आप इन किश्तों के चक्कर में अपना जीवन का लक्ष्य पा सकते हैं। हम रात दिन अपनी पत्नि और बच्चों की इच्छाओं का गलाघोंट कर किश्तें भरते रहते हैं। और इसी चक्कर में हम इस जीवन के जो सुनहरे पल हैं उन्हें गवां देते हैं। हमारी मकान या कोई अन्य चीजों की खरीद हमारे बच्चों के लिये एक अभिशाप साबित हो जाती है। हमें उन्हें सस्ते स्कूल और कॉलेज में एडमिशन दिलाना पड़ता है। जबकि हमने ये सोच रखा था, कि हम तो न पढ़ पाये लेकिन अपने बच्चों को अवश्य ही अच्छी से अच्छी पढ़ाई करवाएंगे। अपनी जीवन की इच्छाओं को एक लम्बे समय तक दबाकर रखना पड़ता है। भले ही मकान की कीमत बढ़ रही हो लेकिन हम उसे बेचने की हालत में नही होते। यदि हमने कार खरीद रखी है लोन पर, तो उसकी कीमत तो नही बढ़नीं। जो लोन हम लेते है वह हमें एक लम्बे समय के लिये रेस ट्रेस से हटा कर रेस के घोड़े से तांगे या घोड़ागाड़ी को खींचने वाला घोड़ा बना देती है। जिसके जीवन में परफारमेंस और तेजदौड़ने की विशेषता मायने नही रखाती। केवल बोझा ही ढ़ोना है।
इस पूरी पोस्ट का ये मतलब नही कि हम अपनी अचल सम्पत्ति न बनाएँ लेकिन हम थोड़ी सी यदि दूर दृष्टि अपनाये तो शायद ये लोन हमें कुंए का मेंढक न बने दे। जिसकी मजबूरी होती है कुं ए में ही रहना। इस लोन के कारण हम दूसरों की नजरों में तो अमीर होते है लेकिन अपनी नजरों में एकदम गरीब होते हैं। ये अचल सम्पत्ति या कार हमारा स्टेट्स सिम्बल बन कर रह जाती है जो हमारे जीवन के अंत समय तक तो हमारे लिये एक किराये पर ली गई चीज साबित होती हैं जिनका कि हमने केवल किराया चुकाया और जब हमारा मालिकाना हक हमने पा लिया या हम लोन मुक्त हो गये तब हमारा शरीर और हमारी इंद्रियाँ इस काबिल नही रह जाती है कि जो इच्छाएं हमने लोन चुकाने में दबा कर रखीं थी उन्हें बढ़ती उम्र में पूरा कर सकें। हमें जो परमात्मा ने स्वयं को जानने के लिये और परमात्मा की भक्ति के लिये जो 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य जीवन दिया था उसे हमने मंहगी चीजें खरीद कर उनकी किश्तें चुकाने में बर्बाद कर दिया। यदि हमारी चादर छोटी है तो हम घुटनों को मोड़कर भी अपना काम चला सकते हैं जरूरी नही कि हम लालच और दिखावे के लिये जीवन को नर्क बना लें। हॉँ यदि आपके पास ढ़ेर सारा पैसा है और आपका फायनेनशियल बैकग्राउंड अच्छा है, और आपको भरोसा है कि लोन की किश्तें चुकने तक अच्छा ही रहेगा तो आप सही हैं लेकिन हमें कोई बड़ा लोन लेने से पहले एक बार तो ये जरूर सोचना चाहिये कि क्या हमारे पास बुरे समय के लिये पर्याप्त धन कमाने के साधन हैं जो सुख पूर्वक हमारे जीवन को चला सकें। इस लोन के चक्कर में हम एक लम्बे समय तक अपने चेहरे को लटका कर या उदास रह कर हमेशा खुशी के क्षणों को नजर अंदाज करते रहते हैं।

रात के अंधकार में, दिल को यों बेकारर न कर,
सुबह जरूर आयेगी, तू इंतजार कर।

मेरे गम मेरे साथ बहुत दूरतलक गये।
मुझमे न देखी थकान तो खुद ही थक गये।।



माया छाया एक सी, विरला जाने कोय।
भागत के पीछे लगे, सम्मुख आगे सोय।।
-संत कबीर


रस तो अनंत था अंजुरी भर ही पिया
जी में वसंत था एक फूल ही दिया।
मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है
कैसे बडे युग में कैसा छोटा जीवन जिया।
-भारत भूषण 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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