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शनिवार, 3 मार्च 2012

ऊँ शांति: शांति: शांति:

शांति पाना है लेकिन पायें कैसे? सबसे पहले तो इस उदाहरण को समझें जैसे जब आप किसी मोमबत्ती या गलती से गर्म तबे पर अंगुलियां छू देने पर जलन का अनुभव करते हैं तो आप उस पर ठंडा पानी डालते हैं या अत्यधिक ठंडा यानि बर्फ का पानी ही डालने लग जाते हैं जिससे कि आपको शांति और शुकुन का अनुभव होता है और आपका दर्द कम हो जाता है। इसी तरह यदि कोई हल्की सी चिंगारी भी हमारे घर में किसी चीज को जलाने लग जाती है तो हम उस पर पानी डालते हैं। और वह बुझ जाती है। इसी तरह गर्मियों में हम जब दोपहर में बाहर से घर में आतें है और हमारे शरीर से पसीना बह रहा होता है तो हम ठंडे पानी को पीने के लिये प्रवृत्त होते हैं। इसी तरह हम भी हमारे जीवन में यही तरीका अपनाकर अपने दिमाग को शांत कर सकते हैं अंतर बस  इतना है कि हमें पानी से नही अपने मस्तिष्क को सततÞ शांत रख कर पूरे शरीर को शुकुन और हानिकारक हार्मोन्न उत्पन्न करने से बचाके रखना है जिससे कि हमारे शरीर के शैल नष्ट होते हैं । जब भी कोई कार्य हमारे अनुसार न हो रहा हो तो पहले उसके आपके
 अनुसार न होने का स्पष्ट कारण पता करें। बजाय कि एकदम से क्रोधित होने के। आपने ध्यान दिया होगा कि जब आप क्रोध में होते हैं तब आपका शरीर कांपने लग जाता है, आप इतना थक जाते है, जितना कि आप कई मीटर दौड़ने या कुछ भारी कार्य करने पर थकते हैं। मै यहाँ क्रोध कम करने के उपाय नही बता रहा हूँ मै आपको ये स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जब हमारा मस्तिष्क सततÞ शांत रहता है तब हम अपने जीवन में हर क्षण में आनंद अनुभव कर सकते हैं। कोई भी कार्य हमारे अनुसार भले ही न हो रहा हो लेकिन उसमें भी आनंद की खोज करें टाइम पास न करें बल्कि उसमें रूचि लें उस पर ध्यान दें कि आखिर उसमें ऐसा क्या है जो हमे उससे जोड़ सकता है। यह एक ऐसी परिस्थिति भी उत्पन्न कर सकता है कि दुख दर्द गम और समस्याएँ भी आपके साथ साथ दौड़ते दौड़ते थक जायेंगी लेकिन आप नही थकेंगे। जैसे एक पत्नी अपने पति को साड़ी की दुकान पर लेकर जाती है पति को लगता है कि शायद पत्नि पूरी दुकान की साड़ियाँ देखने के बाद ही कोई साड़ी लेगी क्या पता न भी ले या अगली दुकान पर फिर समय की बर्बादी हो। इसी तरह पत्नि भी जब पति के साथ किताबों की दुकान पर जाती है और पति एक किताब देखता है फिर उसी टॉपिक पर दूसरी के कंटेंट भी मिलाकर अपनी तसल्ली करने के लिये आधे आधे घंटे तक या पूरी किताब की दुकान पर अपनी विषय सबंधी पुस्तक के रैक में खो जाता है तब पत्नि सोचती है या कभी कभी तो कह देती है जो घर पर किताबों का ढ़ेर लगा है वो तो पढ़ी नही जातीं और यहाँ और खरीदने के लिये समय बर्बाद क्यो कर रहे हो। लेकिन यदि पति और पत्नि एक दूसरे को अच्छी से अच्छी साड़ी या किताब पसंद कराने में मदद करें तो वे एक दूसरे का परिहास नही करेंगें। कुछ लोग इस तरह का उदाहरण पसंद नही करेंगें क्योंकि अधिकतर लोग अपने जीवन में चाह कर भी अपने जीवन साथी से कहीं न कहीं असहमत नजर आते हैं। एक उदाहरण और लेते हैं जैसे एक जानवर के आगे यदि आप गेहूँ की बाली या पौधे पटक दें तो वे उसे बिना गेहूँ से अलग कर खा लेते हैं। लेकिन हम मनुष्यों को परमात्मा ने बुद्धि और विवेक दिया है जिससे हम अपने कार्य को सततÞ निखार ला कर कर सकते हैं जैसे हम गेहूँ को भूसे से अलग कर साफ करके किस्मों में फर्क करके कि कौन सा गेहूँ अच्छा है को खाते हैं। और भूसे का भी उपयोग करते है जानवरों और अन्य कामों में। इसी तरह हमें जो छोटी छोटी बातें जो हमारे मस्तिष्क को चिढ़ चिढ़ाहट पैदा करने और क्रोध के लिये प्रेरित करती हैं उसमें हमें शांति पूर्वक अपने हित की बातें ही लेनी है बाकि की बाते वहीं छोड़कर आगे बढ़ना है। जब हमारा दिमाग चिढ़चिढ़ा होता या रहता है तब हमें झरने को निहारते या फूलों की सुंदरता का आनंद लेते या किसी खेल में आनंद लेते लोग भी मूर्ख और पागल नजर आते हंै। हमें अपने जीवन में रस लेना होगा तब ही हम अपने मनुष्य जीवन में प्रकृति और अपने आसपास हो रही नये नये बदलाब के साथ आनंद का अनुभव कर सकते हैं। हमारे मस्तिष्क को हमें दलदल की तरह नही बनाना है जिसमें कोई भी नई चीज सिवाय कीचड़ के डूब जाती है बल्कि ऐसे शांत सागर या समुद्र की भांति बनाना है जिसकी अंदर या तलहटी में और बाहर किनारों पर न जाने कितने ही ज्वालामुखियों का लावा बहता रहता है लेकिन फिर भी समुद्र गहराई बढ़ने के साथ साथ ही शांत नजर आता है। हमारे मस्तिष्क में भी 80 प्रतिशत पानी ही है और हम जो आक्सीजन लेते है उसका 20 प्रतिशत तो केवल मस्तिष्क ही उपयोग करता है जो कि इसे शांति प्रदान करने के लिये परमात्मा द्वारा बनाया गया है। तो जब परमात्मा की इच्छा है कि हम अपने दिमाग को शांत रखें तो हमें भी कोशिश करना होगी कि हम किसी भी स्थिति में अपने दिमाग को शांत रखें क्यों कि सुख के साधन अर्जित करने पर भी यदि हम शांति पूर्वक उसका आनंद न ले सके तो हमारी मेहनत, पैसा और समय जो हमने सुख अर्जित करने में व्यय किया सब बेकार है।
पैसा कमाने के लिये हम अपनी शांति को क्यो खोंये जब शांति ही नही रहेगी तो ऐसा पैसा हम किसलिये कमा रहे हैं। जैसे एक व्यक्ति ढेर सारा पैसा कमाने के चक्कर में अपनी नींद और चैन खो देता है फिर भले ही वह अपने बेडरूम में ए.सी. को 25 फिर 20 या अंत में नींद न आने पर भी यदि 18 पर भी सेट कर दे तो भी उसे नींद नही आनी। परमात्मा हमें जिस परिस्थिति में भी रखे हमे संतुष्टी के साथ शांति अनुभव करनी होगी और अपने सामर्थ अनुसार धीरे धीरे प्रगति करनी होगी। जैसे एक माली बीज जमींन में बोता है और धैर्य पूर्वक फूल आने का इंतजार करता है। एक दूसरा माली बीज बोते ही कुछ ही दिनों में फूल की इच्छा से रात दिन पौधे को ढेर सारा पानी और खाद देता रहता है लेकिन फूल तो अपने समय पर ही आयेगा, लेकिन वह दूसरा माली चिढ़ चिढ़ा होकर धैर्य खोकर इस बात को जानते हुये भी अपने अशांत दिमाग के कारण इस मूर्खता को करता रहता है और अपनी बची हुई शांति भी खो बैठता है।
अंत में मै यही कहना चाहता हूँ कि जैसे भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर भी शांतिपूर्वक अपने ध्यान में मग्न रहते हैं और लक्ष्मी जी उनके चरणों की सेवा में होती हैं वैसे ही हमें भी अपने परमात्मा की तरह यह कोशिश करनी है। इस संसार रूपी सागर में बड़ी से बड़ी समस्याओं को शांत रह कर हल करना है । और सुख पूर्वक धन कमाना है। स्वयं को शांत रखना एक कठिन कार्य है जो हमें करना है अपने हित के लिये। क्योंकि लोग हमें अशांत यही सोचकर करते हैं कि हम अपना अहित कर बैठें और अपने प्रगति के मार्ग से भटक जायें। याद रखें कि लोगों की चालाकियों का जवाब चालाकियों से नही देना है दिमाग को शांत रखना है कोई उपाय स्वत: ही आपके मस्तिष्क में आ जायेगा। याद रखें कि चालक लोगों पर जब परमात्मा की लाठी चलती है तो उन्हें हमेशा के लिये चालाकियाँ करने से मुक्त्ति मिल जाती है। याद रखें कि परमात्मा के घर देर है अंधेर नही। बस अपने धैर्य के साथ शांति के लिये प्रयासरत रहना है।

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की संपदा, रही शील में आन।।
                                                         -संत कबीर

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