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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

वर्तमान में जीयें, सहनशीलता के साथ (live in present, with tolerance)

  अपने ऊपर किसी तरह की विपत्ती आने पर या बीमार हो जाने पर भगवान को मत कोसो क्योकि जिस परिस्थिति में आप हो या जिस परिस्थिति में आप भगवान को कोस रहे हो वह आपके द्वारा ही निर्मित है। जैसे हमे पता होता है कि यदि हम बबूल का बीज बोएंगे तो भगवान के द्वारा बनाये गये नियमानुसार उस वृक्ष से हमें कांटे अवश्य ही मिलेंगे। एक और उदाहरण है जैसे हमें पता होता है कि फलां तरह के भोजन या चाट पकोड़ी से अवश्य ही हमारी पाचन क्रिया बिगड़ेगी फिर भी हम उसे खाते हैं और उस भोजन की प्रकृति के अनुसार हमें लेट नाईट या प्रात: उसका परिणाम भोगना ही पड़ता है पेट में गैस, लूज मोशन, पेट दर्द, सरदर्द आदि के रूप में। इसलिये ऐसे कर्म करने की कोशिश करो कि जिससे हमें शांति मिले न कि ऐसे जिसे करने पर हमें अपने जीवन में आगे जाकर अशांति का सामना करना पडेÞ। पैसे के पीछे मत भागो क्योकि पैसे के पीछे भागने पर आप अपने परिवार को समय भी नही दे पाते और जिस समय आपको सतसंग करना चाहिये आप उस समय मोबाईल और पता नही कहाँ कहाँ कि जगउलझाऊ बातों में अपने प्रात: का और देर रात सोने का समय उसकी भेंट चढा देते हो। हमें भगवान का धन्यवाद देना चाहिये जब हम विपत्ति में या बीमारी में होते हैं तो वह विपत्ती या बीमारी हमें इन सब दौड़भाग से ऊपर उठा कर ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम अपने शरीर को कहाँ कष्ट के गर्त में झोंक रहें हंै और ये जान पाते हैं कि हमारे स्वस्थ को क्या हानि हुई है। दुख बीमारी हमेशा हमें कुछ न कुछ गलत आदतों या हम अपनी दैनिक जीवन में जो गलती कर रहे होतें है के प्रति सचेत कर जाती है और ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उस आदत को हमेशा के लिये छोड़ दे या उस आदत से निजात पाने के लिये संकल्पित हो जायें जो कि हमारे स्वास्थ के लिये और हमारी बची जिन्दगी को आसान बना देगी। यदि आप पैसे कमाने को ही सबसे बड़ा लक्ष्य अपने जीवन का बना कर रखे हुए हैं तो कभी किसी बुजुर्ग के पास कुछ समय बैठें या कभी किसी श्मशान में जाकर देखें कि कोई भी अपने अंतिम समय में कुछ साथ लेकर नही जाता और जो उसने कमा कर प्रोपट्री और बैंको में ठंूस रखा है उस प्रोपट्री के कारण उसे अपने अंतिम समय में भी चेन नही मिलता और उसके धन पर उसके ही बहु बेटों और पत्नि की नजर रहती है। यदि हम किसी युवा मनुष्य के पास जायें तो वह हमेशा भविष्य की बाते करता है उन अथाह पैसा कमाने वाले अंधे रास्तों की बातें करता है जिसे न जाने वह कब ढ़ूढ पायेगा। हमें पैसे उतना ही कमाना चाहिये जिससे कि हम संतोष पूर्वक अपने परिवार का चिंता रहित होकर भरण पोषण कर सकें इतने धन की चाह में अपना जीवन बर्बाद न करें जिसे आप इस मनुष्य जीवन में न उपभोग कर सकें इसके लिये अपने मन मस्तिष्य में उन लोगों का जीवन याद करें जो आज देश की बड़ी जेलों में हजारों करोड़ों रूपये के घोटालों और देश की अर्थव्यवस्था को चूना लगाने के अपराध तथा अपने व्यवसाय के गलत तरीके से विस्तार करने और कर चुराने के घपले में जेलों में अपना बचा जीवन व्यतीत कर रहें हैं। अब अंत में हम उस बच्चे को देखें जो न अतीत में, न ही भविष्य की बातों में अपना मनुष्य जीवन का आनंद लेता है वह तो वर्तमान में जीता है यदि हम उसे कहें कि ये चाकलेट लो और कल खा लेना तो वह उस चाकलेट को कल के लिये नही छोड़ेगा वह आज ही उसका उपभोग करेगा उस बच्चे को न कल कि चिंता होती है न वह आपसे ये कहता है कि आपने उसे कल डांटा था या चाकलेट नही दी थी यदि क्योकि जो चाकलेट उसके पास है उसका वह वर्तमान में भरपूर आनंद लेता है। जैसे कि मैने शुरू में बताया है कि भगवान के नियमानुसार ही हमें बबूल का बीज बोने पर बबूल का वृक्ष ही मिलेगा जिसमें कांटे भी होंगे। भगवान ने अपने जो कानून और नियम तय कर रखें है उसे स्वयं भगवान भी नही बदलते चाहे आग में हाथ बूढ़ा डाले, युवा डाले, मूर्ख डाले, विद्वान डाले, बच्चा डाले या और महान पुरूष डाले उसे उसी जलन का अनुभव होगा जो सभी को होता है इसलिये हमें उन कर्मों की ओर प्रवृत्त होना है जिसमें हमें भविष्य में अच्छे कर्मफल की प्राप्ति हो। (हमेशा याद रखें की लोभ को आप संतोष से मर सकतें हैं,  इसलिए जीवन में संतोषी रहने की आदत डालिए यह भागवत कथा में कहा गया है)

इसकी शुरूआत किजिये जब हमें कोई ऐसी बातें कहे जिससे हमें अपमान का अनुभव हो जिससे हमारी छवि को अघात पहँुचे या हमें उन बातों पर तुरंत क्रोध आ जाये तो भगवान का स्मरण कर मन ही मन उस व्यक्ति को क्षमा कर उन बातों को सहनशीलता की शक्ति से सहन किजिये। फिर इसे आदत बना लिजिये और अपने में एक बड़ा परिवर्तन पाइये। शास्त्रो में कहा गया है कि हमें अपमान को सहन करना और मान को पचाना आना चाहिये नही तो अपमान को न सहन कर पाने के कारण हम क्रोध कर अपना ही अहित कर बैठते है जिसके अन्य परिणाम भी हमे ही भोगने पड़ते हैं। जैसे दुर्योधन ने स्फटिक के पांडवों के महल में अपना अपमान सहन नही किया और वहीं से वह बदले की भावना से ग्रसित हो गया और अपने कौरव वंश के नाश का कारण बना।और मान को पचाना आना चाहिये क्योकि जो लोग मान को पचा नही पाते वे अभिमान के वभीभूत होकर अहंकार के कारण अपना विनाश कर लेतें है जैसे रावण ने अभिमानवश अपनों और अपना विनाश किया।

हमेशा याद रखो कि जो हमेशा बढता है वह है हमारे मन में धन का लोभ है और जो हमेशा घटती है वह है हमारी उम्र और जो कभी भी न तो घटता है और ना ही बढ़ता है वह है परमात्मा का विधान. जैसे आम के पेड़ में हजारों साल पहले भी आम फलता था और अब भी आम ही फलता है. और जैसे हजारों साल पहले भी अग्नि जलाती थी और अब भी जलाती है.

  जब हमारे साथ कुछ बुरा होता है तो हम कहते हैं कि ये भगवान की ने किया और हम भगवान को कोसने लगते हैं कि सब लोग सुखी हैं मै क्यों दुख भोग रहा हँू। गीता में भगवान ने कहा है कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो। फल की इच्छा के बारे में मनुष्य ये सोचता है कि इस कर्म का फल उसके ही अनुसार कडवा या मीठा मिलेगा लेकिन ये तो परमात्मा ही तय करते हैं कि इसका फल क्या होगा। हमें परमात्मा ने कर्म करने की पूरी आजादी दी है। जब हम कोई पुण्य का काम या कोई अच्छा कर्म करते हैं तो हमारी आत्मा को खुशी होती है। लेकिन जब हम कोई बुरा काम करते हैं तो उसी जीवात्मा या कहें कि हमारे अंत:करण से एक आवाज आती है कि ये बुरा काम मत करो लेकिन हम उस आवाज को दरकिनार कर उस बुरे कर्म को करते हैं जब हम उस बुरे कर्म को दुबारा करते हैं तो वह आवाज जरूर आती है लेकिन हम उसे अनसुना कर देते हैं पहले की तरह और फिर अगली बार वही बुरा कर्म करते हैं इस बार वह आवाज नही आती जिससे हम उस बुरे कर्म को करने के आदी हो जाते हैं। जैसे चोर जब पहली बार चोरी करता है तो वह घबराता है और जब वह प्रोफेशनल चोर हो जाता है तो वह बिना किसी घबराहट के उस चोरी के कर्म को अपना कर्तव्य समझ कर करने लगता है। और जब परमात्मा उन बुरे कर्मों के फल हमें देना प्रारंभ करता है तो हम अपनी दुखदायी परिस्थिति के लिये परमात्मा को कोसते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि दानपुण्य, गंगा स्नान, कर्मकांड कर लेंगे तो ये पाप कर्म धुल जायेंगें लेकिन परमात्मा के विधानुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं 1. मंद कर्म 2. तीव्र कर्म 3. तरतीव्र कर्म जो मंद कर्म होते हैं वे दान पुण्य से तो धुल जाते हैं लेकिन तो तीव्र कर्म होते हैं उनके फल हमें इसी जीवन में भोगने पड़ते हैं और जो तरतीव्र कर्म होतें है वे हमें अगले जन्म में और इस जन्म के बुढ़ापे तक भोगने पड़ते हैं। अब हमारे अंदर ये प्रश्न उठता है कि कर्माें के प्रकार कैसे तय करें तो हमें अध्यात्म की ओर चलना चाहिये न कि कर्मकांडों में रातदिन लगे रहना चाहिये। वेद, पुराण और उपनिषद ये अध्यात्म के मार्ग हैं। ये बात नोट करलें कि अध्यात्म के मार्ग को अपने जीवन के कर्म करते हुये और अपने परिवार के साथ रहकर अपनाना है। ना कि अपने कर्तव्यों से विमुख होकर, घरवार छोड़कर जंगल में जाकर। इसकी शुरूआत आप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सत्संग कर कर सकते हैं। दिन की शुरूआत में पहले भगवान से मिलो, उसके बाद भगवान के वंदों से मतलब ये है कि सुबह से ही न्यूजपेपर और घर की समस्याओं में मत खो जाओ पहले प्राणायाम, सत्संग और अपने गुरू के निर्देशन में जप, ध्यान करो। आप ये सोच रहे होंगे कि ये सब तो बुढ़ावे में कर लेंगे लेकिन जैसे हम हमेशा ताजे और खिले हुये फूल ही भगवान के चरणों में चढ़ाना पसंद करते हैं न कि मुरझाये और सुखे। उसी प्रकार समय रहते हमें परमात्मा की ओर अग्रसर होना है जब हम अपने जीवन में खिले और तारोताजा होते हैं। नाकि बुढ़ापे में जब हमारा शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। जिस समय हमारा शरीर हमें एक बोझ प्रतीत होता है। बुढापे में हम अभ्यास के आभाव में न तो प्रणायाम कर सकते हैं ना ही ध्यान, जप जिसमें कि लम्बे समय तक स्थिर होना पड़ता है।
एक नास्तिक ने अपने घर की दीवार पर लिखा God is nowhere लोग देखते और सोच में पड़ जातें. एक दिन एक संत पुरुष उसके घर के सामने से गुजर रहे थे. उन्होंने लिखा God is now here.

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