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मंगलवार, 8 मार्च 2011

मैनेजमेंट से लड़ने से अच्छा है अपने अंदर छुपी हुई मजबूरी को पहचाने

जब हम छोटे थे तब हमारे माता-पिता हमे पढ़ने के लिये बहुत ज्यादा फोर्स करते थे, हममें से कुछ ने तो अपने स्कूल टाइम में स्कूल की अन्य गतिविधियाँ जैसे खेल, सांस्कृतिक कार्यक़्रम में हिस्सा लेना आदि छोड़ दिया या हमें इन चीजों से जैसे चिढ़ ही हो गई । हम किताबी कीड़े बन गये पर किताबी कीड़े बनने के लिये भी अत्यधिक मेहनत की जरूरत होती है हमारा किताबी कीड़ा होने के पीछे एक स्ट्राँग कान्सेप्ट काम करता है हमारा लक्ष्य।
 लक्ष्य जिसे हम फिल्में देखकर या किसी आदर्श व्यक्ति को देखकर या हमारे उन अमीर दोस्तों को देखकर जो हमारी तरह गरीब नही होते थे और खुलकर पैसा खर्च करते थे तय करते हैं। यही लक्ष्य आगे जाकर हमारी मजबूरी बन जाता है।
जब हम पढ़ लिख कर किसी नौकरी को ज्वाइन करते हैं तो हमेशा हमारा लक्ष्य हमारे दिमाग में हमें सरदर्द देता रहता है। और इसी लक्ष्य की खातिर हम जरूरत से ज्यादा अपनी नौकरी में मैनेजमेंट के गलत निर्णय या ये कहें कि टॉप मैनेजमेंट ने जो एमडी या मैनेजर नियुक्त किया है के अनुसार अपना कार्य करते हैं शुरू-शुरू में हमें उस मैनेजर की बातें एक लीडर की तरह लगती है जो हमें प्रगति के पथ पर या हमारे लक्ष्य के सहायक होने के लिये हमारा आइडियल बन जाता है किंतु समय के साथ साथ हमें यह महसूस होने लगता है कि वह मैनेजर टीम भावना से नही व्यक्तिगत भावना से अपनी इमेज बनाने के लिये हम जैसो को अपने तानाशाह निर्णयों की गर्त में धकेलता रहता है।
हम यह सोचते हैं कि टॉप मैनेजमेंट इस ओर ध्यान क्यो नही देता यहॉं मै आपको बताना चाहता हूँ कि जैसे कुछ समय पहले सरकारी आॅफिसों में वहाँ के कर्मचारी अपने अधीनस्थों के परेशान रहते थे और अधिकतर अपना समय चाय की दुकानों में या अपनों दोस्तों के साथ बेवजह की पार्टियों में समय देकर अपना टाईम पास करते थे या गवरमेंट द्वारा दिये गये हर अवकाश को पूरा इंजॉय करते थे, क्योकि गवरमेंट नौकरी छोड़ तो सकते नही जो है करनी तो है। ये उनकी मजबूरी होती थी।
आज के जमाने में गवरमेंट नौकरी तो मिलती नही इसलिये हम सभी अपने योग्यता के आधार पर प्राइवेट जॉव ही करना पसंद करते हैं।
हॉं तो बात कर रहे थे उस मैनेजर की जो अपनी इमेज बनाने के चक्कर में हमें इतना तनाव देता है जो हमें हमारे घर और टॉयलेट में भी शुकून नही लेने देता है । हम सोचते हैं कि टॉप मैनेजमेंट इस मैनेजर को क्यो रखके रखा हुआ है। यह टॉप मैनेजमेंट उस गंधारी या उस धृतराष्ट्र की तरह होता है जिसे अपनी जनता से नही बल्कि उस दुर्योधन से प्यार होता है जो वह मैनेजर होता है। गंधारी या धृतराष्ट्र ने ऐसा क्यो किया यह आज भी एक सवाल है। इसका हल हमारे भी पल्ले नही पड़ता चाहे आप इन धृतराष्ट्रों के कानों में कितना भी चिल्लाएँ उन्हें तो दुर्योधन का मोह होता है। लास्ट में हमें एक ही हल समझमें आता है नौकरी छोड़ना इस नौकरी को छोड़ने की उधेड़बुन में हम भी उन टाइम पास कर्मचारी जो हमारे आॅफिस में भी मौजूद होते हैं की तरह चाय की दुकानों में ये फालतू कामों के लिये छुट्टियाँ लेकर अपना टाइम पास करना पसंद करने लगते हैं किंतु जो हमारा लक्ष्य है वह हमें घर पर या चाय की दुकान पर भी चैन नही लेने देता जिस लक्ष्य की खातिर पर पता नही कितनी ही नौकरियाँ छोड़ चुके होते हैं। और यही लक्ष्य हमारी मजबूरी बन जाता है।
यहॉं मै आपको एक भयानक सलह देना चाहता हूँ यदि आपका आर्थिक पक्ष 5 प्रतिशत भी अच्छा है यानि की आप अपने पारिवार को कुछ समय तक बिना नौकरी के पाल सकते हैं तो यह नौकरी छोड़ दें।
और कुछ समय कहीं एकांत में जाके सोचें कि जिस लक्ष्य के लिये आपने अपना सुख-चैन खो दिया है उसको हम बिना नौकरी करें कैसे पा सकते हैं यदि नहीं पा सकते हैं  (यहाँ मेरा मतलब किसी चोरी या डकैती में अपने आप को लिप्त करने से नही है ना ही किसी आपराधिक प्रवृत्ति को अपनाने से हैं यहाँ मेरा मतलब है कोई छोटा मोटा नया बिजनेस आइडिया जैसे जब तक हम रेगिस्तान में रहते हैं हमेशा रास्ते ही तलाशते रहते हैं किंतु यदि हम उस रेगिस्तान को ही छोड़कर कहीं ओर विचरण करें तो कुछ हद तक रास्ते तलाशने में होने वाली परेशानियों का अंत होगा) तो तय कर लिजिये इस लक्ष्य को छोडने का  क्योकि हम उस लक्ष्य को नही भेद सकते जो हमारे धनुष वाण की पहँुच से अत्यधिक दूरी पर हो और जो हमें अब धुंधला दिखाई देता हो, और बिना किसी के प्रेशर से अपनी नई नौकरी करने का। इस तरह आप अपना 90 प्रतिशत तनाव कुछ समय के लिये कम कर सकते है लेकिन मुझे मालूम है यह अत्यधिक कठिन कार्य है क्योकि बिना नौकरी हम जैसे लोग बिना पेट्रोल की गाड़ी की तरह हो जाते हैं जिसे धक्का मार कर ज्यादा से ज्यादा 5 कि.मी. तक ही ले जाया जा सकता है यदि रास्ते में चढ़ाई याने कि यदि किसी लोन की ईएमई हो तो असंभव है। और हम जिंदगी भर किसी अच्छी जगह, अच्छे होली-डे मानने की चाहत लिये। अपनी जिंदगी को किसी तरह गुजार रहे हैं।
मैने कुछ उपाय अपनाये हैं जिन्हें मै आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ
किसी संस्था में नौकरी प्रोफेशनल की तरह अपनी भावनाओं को दबाकर अपने काम से मतलब रख कर अपने अधिकारियों की हॉं में हॉं मिला कर।
दोस्तों से दूरी बना कर
न्यूज चैनल्स नही देखना केवल न्यूज पेपर ही पढ़ना
लाइफस्टाइल चैनल्स देखना जैसे डिस्कवरी टीएलसी, फोक्स हिस्ट्री, नेट जिओ, डिस्कवरी और धार्मिल चैनल्स के कुछ खास कार्यक्रम
घर में अपने क्रोध पर काबू रखना, जब आपको किसी बात पर क्रोध आये घर या आॅफिस या कहीं भी कम से कम उस क्रोध के रियेक्शन को 30 मिनट के लिये होल्ड करने की शक्ति को अपनाना। इस समय के बीत जाने पर आप पायेंगे कि आपसे जो गलत होने वाला था आपने अपनी सहायता स्वयं   करके इस पर काबू करने में एक सराहनीय कार्य किया।
बच्चों के साथ बच्चों की तरह बातें करना।
बाहर के खाने से बचना
यदि कोई छोटी मोटी बीमारी हो तो उसके लिये केवल आयुर्वेदिक दवाईओं का सेवन करना इससे आप कुछ नया इन्ट्रेस्टिंग महसूस करेंगे और आपको दवाओं के संबंध में जानकारी भी मिलेगी।
गाड़ी में यदि कहीं पेट्रोल खत्म हो जाये तो (जब फैमली साथ न हो और आॅफिस के समय और दोपहर को छोड़ कर) तो पेट्रोल पम्प तक गाड़ी धका कर ले जाये । इससे आपको नया अनुभव होगा। आपके टैक्सी के पैसे भी बचेगे और दूसरों से हेल्प माँगने की प्रवृत्ति कम होगी।
और भी बहुत से तरीको पर मै आजकल खोज कर रहा हूँ। आज कुछ ज्यादा ही बोरिंग आर्टिकल में आप शायद पक गये होंगे।


24 sept'11 bhaskar bhopal page8
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