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शुक्रवार, 1 जून 2012

संतुष्टि और सम्पूर्णता पाने की व्याकुलता Turn your Daily Life toward spirituality

एक बार एक गांव का होशियार शहर की ओर चल दिया, बड़ा खुश होकर। शहर पहुंचकर एक सुनार की दुकान पर गया और स्वयं को दीनहीन दिखाने का प्रयत्न करने लगा। उसने उस सुनार से कहा कि सेठ जी, गांव से पैसे लेकर निकला था लेकिन यहाँ शहर में चोरों ने मेरा पूरा धन लूट लिया अब आप यदि मेरी कुछ धन से सहायता कर दें तो मै अपने गांव लौट सकंू आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। तब उस सेठ ने कहा कि देखों भाई मैने यह दुकान दान धर्म के लिये तो नही खोली है मेरा पूरा परिवार मेरी इस दुकान के भरोसे है। हाँ यदि तुम्हारे पास कोई वस्तु हो तो मै उस वस्तु को गिरवी रख कर तुम्हे कुछ धन दे सकता हूँ। तब उस गांव के होशियार ने कहा कि सेठ जी गिरवी रखने के लिये मेरे पास कोई कीमती वस्तु तो नही है, यदि आप मेरे पास जो एक पीपे में शुद्ध घी है खरीद लें तो मेरी कुछ आप सहायता कर सकते हैं। तब उस सुनार ने मरे का माल सस्ते में खरीद लिया यानि एकदम आधे दाम में शुद्ध घी और उसने कहा कि देख भाई इतनी सुबह सुबह तो कोई ग्राहक आया नही, हाँ यदि तू कहे तो मै तुझे कुछ सोने के सिक्के और आभूषण दे सकता हूँ। तब उस किसान की लार टपकने लगी उसने झट से उस सुनार से आभूषण लिये और अपने गांव की ओर कूच कर गया। अब जब सुनार अपने घर में दोपहर के भोजन के लिये आया जो कि दुकान से ही लगा हुआ था और साथ में घी का पीपा भी लाया। तब उसने कहा कि सेठानी आज रोटी में इस पीपे से घी निकाल कर लगा कर देना।  सेठानी ने पीपा एक बर्तन में खाली किया तो देखा कि ऊपरी परत पर तो घी था बाकी नीचे पूरा गोबर ही गोबर भरा हुआ था। तब उस सेठ ने यह जानकार कोई प्रतिक्रिया नही की केवल एक हल्की सी मुक्कान उसके होठों पर तैर गई। अब जब वह गांव का होशियार अपने गांव पहुंचा तो अपनी पत्नि से उसने कहा कि लो ये आभूषण मै तुम्हारे लिये शहर से खरीद कर लाया हंू। तब उसकी पत्नि ने कहा कि पहले इन्हे अपने गांव के सुनार से जांचवा तो लो कि कहीं नकली न हों। तब उस गांव के होशियार चंद की होशियारी छू हो गई जब गांव के सुनार ने बताया कि पूरे के पूरे आभूषण और सोने के सिक्के नकली हैं।
इस कहानी को यदि हम अपने आस पास के लोगों से अपने ही जीवन से जोड़कर देखें तो पाएंगे कि लोग अपने बच्चों का विवाह अच्छे से अच्छे परिवार में करने के लिये इसी तरह एक दूसरे को अपनी होशियारी दिखा रहे हैं लेकिन दोनों ही कुछ समय बाद यह जानकर दुखी और तनावग्रस्त हो जाते हैं कि हम जिसे मूर्ख बनाने निकले थे उसने ही हमें मूर्ख बना दिया। अब यहाँ से शुरू होती है कलह जो कि एक परिवार के बिखराव और आपसी मनमुटाव का कारण बनती है सास बहु को कोसती है, पत्नि अपने पति का सर खाती है कि चलों कहीं ओर जाकर रहें भले ही एक सिंगल रूम में ही किसी दूसरे एरिये में रह लेंगे लेकिन अब यह सहन नही होता। अब पति माँ कि सुने कि पत्नी की आगे कुंआ पीछे खाई, कोई तरकीब काम न आई। आखिर सुनना पत्नि की पड़ती है। इसका उल्टा भी होता है जब घर में एक ससुर अपनी बहु द्वारा प्रताड़ित होता है उसे देखकर लगता है जैसे वह पत्थर को पूजते पूजते स्वयं की पत्थर हो चला है उसे कोई ताने वाने असर नही करते वह तो केवल यह सोचकर ही उसघर में रहरहा होता है कि कम से कम अपना अंतिम समय तो अपने परिवार के साथ बिता दूं। पति यह सब देखकर कर दुखी तो होता है लेकिन रहना तो आखिर पत्नि के साथ ही है अन्यथा कानूनी पचड़े। पिता को वह पैसे देना चाहता है लेकिन पत्नी उस पर कड़ी नजर रखती है कि कहीं पतिदेव अपनी कमाई से कुछ पैसे बचाकर अपने पिता को जेबखर्च तो नही दे रहे। पति भी बड़ा समझदार होता है जब पिता सुबह मार्निंग वॉक पर जाते हैं तो कुछ देर बाद बेटा भी लुंगी पहनकर घुमने निकल पड़ता है अब पत्नि यह सोचकर बेफ्रिक होती है कि लुंगी और बनियान में तो कोई जेब है नही। लेकिन पति भी नोटों को मोड़कर लुंगी में दबा लेता है और दूर कहीं घूमते घूमते, बालकनी में खड़ी पत्नी से नजर बचाकर अपने पिता को जेबखर्च दे ही देता है। एक और परिस्थिति होती है जहाँ केवल सास की ही चलती है तब लड़की वालों और पति को अहसास होता है कि विवाह से पहले सास-बहु की कुण्डली मिलवाने का रिवाज शुरू होना चाहिये न की होने वाले पति की, क्योकि पति तो बेचारा कोल्हू की बैल की तरह 12-18 घंटे तो घर से बाहर ही गुजारता है और घर में केवल 8-9 घंटे उसमें से भी 6 घंटे सोने में। इन परिस्थितियों में लोग एकदूसरे से संतुष्ट नही होना चाहते ना ही वो एक दूसरे में कोई संपूर्णता खोजते हैं बस केवल एक दूसरे ही निंदा चुगली में ये शो करते हैँ कि भले ही आप सोने के बन जाओ हमारा व्यवहार नही सुधरेगा। वे ये सोचकर अपनी किस्मत को कोसते हैं कि उनके निर्णय उनके लिये नासूर बन चुके हैं। बस वे एक दूसरे से छूटकारा पाने के लिये व्याकुल हैं और तनाव लेते हैं और अपने परिवार को देते हैं। ये तो ऐसे चर्चा के विषय हैं जो हम परिवार में चर्चा कर सकते हैं लेकिन एक ओर विषय है जो एक पति पत्नि में होता है जिसे वे किसी से चर्चा करना स्वयं की ही कमजोरी समझते हैं जो वे किसी पर जाहिर नही करना चाहते। इसे सभी समझते हैं   इसलिये ही यह कहावत प्रचलित है कि हमें अपने से ज्यादा अपने पड़ोसी की बीबी सुंदर लगती है। हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि किसी लड़की या लड़के से प्रेम संबंध गलत बात है। इसी को हमारे माता पिता भी फॉलो करते हैं और हम अपने जीवन साथी से असंतुष्ट रहते हैं क्योकि हमारी पत्नि को ये शुरू से ही सिखाया जाता है कि किसी से प्रेम करना गलत बात है। और होता अधिकतर यह है कि हमारी पत्नि हमारी या तो दादी माँ बन जाती है जो हमें अपने अनुसार चलाना चाहती है या केवल एक लेडी बॉस जो गलत काम बर्दाश्त नही करती उसकी नजरों में अपने माता-पिता को सहायता देना उनका ख्याल रखना एक गलती होता है। पति से प्रेम करना उसके लिये एक इच्छित आॅप्शन होता है करो या छोड़ दो। अब जो पति महोदय है वे बाहर किसी संतुष्टि की तलाश में रहते हैं जो कि एक मृगतृष्णा होती है कभी खत्म होने का नाम नही लेती क्योकि उसे वह निस्वार्थ प्रेम नही मिल पाता जिसके लिये वह व्याकुल है जैसे किसी को 99 लाख मिल जायें तो वह करोड़पति बनने की चाह में एक लाख और कमाने के लिये तनावग्रस्त या व्याकुल रहता है। जैसा कि हम सीखते आये हैं कि केवल फूल को मत देखो कांटे भी देखो चंूकि कांटों की संख्या फूल से ज्यादा होती है इसलिये हम उलझ जाते हैं सम्पूर्णता की तलाशते तलाशते तनाव, क्रोध , चिड़चिडाहट और नशे पत्ते में। क्योकि हम कांटो पर फोकस किये रहते हैं न कि फूल की सुंदरता में। ये हालत पति या पत्नि दोनो की हो सकती है। निस्वार्थ प्रेम पनपे भी तो कैसे अहंकार और जो पूर्वाग्रह है आड़े आता है। दोनों ही सोशल नेटवर्किंग साईट और अपनी वर्किंग लाईफ में किसी सम्पूर्णता की तलाश में रहते हैं उस आनंद की तलाश में रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप की वे इस जीवन में आये। यहाँ थोड़ा रूकें चिंतन करें और एक टार्निंग लें। यहाँ यदि हम स्वयं को अनुशासित कर गलत रास्ते में जाने से रोक पायें तो हम स्वयं की एक बहुत बड़ी सहायता कर सकते हैं। हम अपनी व्याकुलता को किसी सेवाकार्य या के्रटिविटी और अन्य हॉबी में या जो हमें आता है उसे जरूरतमंदों में सिखाने में लगाये तो हम अपने मन को व्यस्त रख कर अपनी व्यथा को कम कर सकते हैं। यदि ये भी न कर सकें तो आध्यात्मिक ज्ञान और परमात्मा के ध्यान की शरण में तो आ ही सकते हैं। जिस दिन से हम आध्यात्मिक ज्ञान रूपी अमृत का स्वाद चखते हैं हमें लगता है कि आज तक तो हम केवल मरूस्थल में भटक रहे थे मृगतृष्णा से वशीभूत होकर, लगता है जैसे आज ही हमारी एक नई जिन्दगी शुरू हुई है, अभी तक तो हम एक काल कोठरी में ही या कुंए में ही अपने जीवन को पूरा करने का लक्ष्य तय कर जीवन यापन कर रहे थे। हम रात दिन स्वयं के बारे में ही बुरा और निराशा भरी बातें सोचते रहते थे। हमारे गुरू की वाणी ही हमारे लिये शांति का मार्ग प्रशस्त करती है जैसे एक नदी बहती है, सागर से मिलने के लिये। वैसे ही हमें लगता है कि हमारी यात्रा तो अब शुरू हुई है। अनंत से मिलने और परमआनंद पाने के लिये। बुद्धिमानी तो आज तक थी ही लेकिन अब एक समझ विकसित होने लगती है। हम चिंता को त्याग कर चिंतन करते हैं समस्या के समाधान का, दूसरों की निंदा त्याग कर वाणी का संयम करते हैं, कागज के दुकड़ो का मोह जाता रहता है जो कि जो 99 प्रतिशत तनाव का कारण होता है।

 
इस पूरी पोस्ट का सार यह है कि जैसे किसी को गुलाब के  फूलों के बगीचे में भेज दें और वह वापस आये तो आप पाये कि उसकी झोली में केवल कांटे ही कांटे हैं। आप उसे निहायती बेवकूफ या महामूर्ख कहेंगे। इसी स्थिति से हमें निकल कर ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा स्वयं के अंदर समझ विकसित करनी है जो केवल फूलों को ही चुने ना कि कांटो को अपनी झोली में भरकर जीवन को दुखी करता चले। जिसे हम अपने लिये अभिशाप मानते हैं उसे हमें दूसरों के लिये वरदान साबित करने की यात्रा करनी है ताकि हम दूसरों को प्रसन्न करते हुये स्वयं भी सुख व प्रसन्नता का अनुभव करें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. आध्यात्मिक ज्ञान मृगतृष्णा से बचाता है !
    एकदम सत्य!

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